Edited By Kuldeep, Updated: 21 Sep, 2026 09:32 PM

हाईकोर्ट ने बिजली उपभोक्ताओं के हित में एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 126 के तहत किसी भी उपभोक्ता पर अनधिकृत बिजली उपयोग का जुर्माना लगाने से पहले संबंधित अधिकारी द्वारा परिसर का भौतिक...
शिमला (मनोहर): हाईकोर्ट ने बिजली उपभोक्ताओं के हित में एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 126 के तहत किसी भी उपभोक्ता पर अनधिकृत बिजली उपयोग का जुर्माना लगाने से पहले संबंधित अधिकारी द्वारा परिसर का भौतिक निरीक्षण करना अनिवार्य है। केवल ऑडिट पार्टी या ऑडिट अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर सीधे पैनल्टी या असैसमैंट ऑर्डर जारी करना कानूनन गलत है।
यह निर्णय न्यायाधीश संदीप शर्मा ने हिमाचल प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड लिमिटेड द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए सुनाया। कोर्ट ने शिमला के मंडलायुक्त (अपीलीय प्राधिकरण) के उस आदेश को सही ठहराया, जिसने विद्युत बोर्ड द्वारा उपभोक्ता मैसर्स सनॉक्स इंटरनैशनल पर लगाए गए 1,65,34,470 रुपए के जुर्माने को रद्द कर दिया था।
विद्युत बोर्ड का आरोप था कि नालागढ़ स्थित उपभोक्ता फर्म ने मार्च 2011 से नवम्बर 2015 के दौरान स्वीकृत लोड से अधिक बिजली का इस्तेमाल किया। इस कथित अनधिकृत उपयोग को नवम्बर 2016 में विद्युत बोर्ड की एक ऑडिट टीम ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज किया था। इसी ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर बोर्ड के असैसिंग ऑफिसर (वरिष्ठ अधिशासी अभियंता, नालागढ़) ने फर्म को 1.65 करोड़ रुपए से अधिक का अंतरिम और फिर अंतिम असैसमैंट ऑर्डर दिया।
इसके खिलाफ उपभोक्ता ने अपीलीय प्राधिकरण का दरवाजा खटखटाया। अपीलीय प्राधिकरण ने जनवरी 2023 में बोर्ड के इस आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि बोर्ड ने बिना किसी भौतिक निरीक्षण और तय प्रक्रिया का पालन किए बिना यह जुर्माना लगाया है। इस फैसले को विद्युत बोर्ड ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में असैसिंग ऑफिसर ने कभी उपभोक्ता के परिसर का दौरा ही नहीं किया।
पूरी कार्रवाई महज ऑडिट अधिकारी की रिपोर्ट पर आधारित थी, जोकि कानून के तहत जुर्माना तय करने के लिए अधिकृत 'असैसिंग ऑफिसर' की श्रेणी में नहीं आते। हाईकोर्ट ने अपीलीय प्राधिकरण के फैसले को बरकरार रखते हुए साफ किया कि बिजली नियमों और कानूनों का पालन करना बोर्ड के अधिकारियों के लिए अनिवार्य है और वे किसी भी उपभोक्ता पर नियमों को ताक पर रखकर एकतरफा वित्तीय बोझ नहीं डाल सकते।