Edited By Kuldeep, Updated: 09 Jul, 2026 11:22 PM

अदालतों का कीमती समय बर्बाद करने और न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने की कोशिशों पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अब तक का सबसे कड़ा और ऐतिहासिक रुख अपनाया है।
शिमला (मनोहर): अदालतों का कीमती समय बर्बाद करने और न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने की कोशिशों पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अब तक का सबसे कड़ा और ऐतिहासिक रुख अपनाया है। न्यायाधीश राकेश कैंथला ने याचिकाकर्त्ता द्वारा दायर की गईं 9 अलग-अलग याचिकाओं को बेबुनियाद ठहराया और याचिकाओं को खारिज करते हुए प्रत्येक मामले में 10,000 रुपए के हिसाब से उस पर कुल 90,000 रुपए का जुर्माना लगाया है। इसके साथ ही सुनवाई के दौरान अलग-अलग निचली अदालतों के न्यायिक अधिकारियों (जजों) पर बार-बार भ्रष्टाचार के गंभीर और मनगढ़ंत आरोप लगाने के कारण कोर्ट ने याचिकाकर्त्ता के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू करने के निर्देश भी दिए हैं। कोर्ट ने आदेश दिया कि जुर्माने की यह पूरी राशि 4 हफ्तों के भीतर 'चीफ जस्टिस डिजास्टर रिलीफ फंड' में जमा करवाई जाए।
यह पूरा विवाद याचिकाकर्त्ता के शिमला स्थित एक पब्लिक स्कूल में शिक्षण पद से जुड़े सेवा विवाद और कुछ अन्य मामलों से शुरू हुआ था, जहां उसे दिसम्बर 2019 में निलंबित करने के बाद दिसम्बर 2021 में सेवा से हटा दिया गया था। उसके बाद याचिकाकर्त्ता ने एक के बाद एक लगातार आपराधिक शिकायतें दर्ज करवाना शुरू कर दिया। 2 मामलों में याचिकाकर्त्ता ने सीधे मानवाधिकार आयोग के समक्ष हलफनामा देने वाली एक महिला और एक पुरुष अधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करवाने की मांग की। तीसरे मामले में याचिकाकर्त्ता ने सीधे मैजिस्ट्रेट कोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मैजिस्ट्रेट से प्राथमिकी का आदेश मांगने से पहले एसएचओ और फिर एसपी के पास शिकायत लेकर जाना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
हाईकोर्ट की सबसे सख्त टिप्पणी: जजों को 'भ्रष्ट' कहना पड़ा भारी।
न्यायालय की नाराजगी तब चरम पर पहुंच गई जब कोर्ट ने देखा कि याचिकाकर्त्ता ने केवल बेबुनियाद याचिकाएं ही दायर नहीं कीं, बल्कि न्याय देने वाले जजों को ही अपनी याचिकाओं में आरोपी बना डाला। याचिकाकर्त्ता ने स्कूल और लैटरपैड से जुड़े रिवीजनल मामलों में सुनवाई करने वाली निचली अदालत की महिला न्यायिक मैजिस्ट्रेट और एडिशनल सैशन जज को ही याचिकाओं में आरोपी के रूप में नामजद कर दिया। याचिकाकर्त्ता ने अदालती दस्तावेजों में लिखित रूप से यह संगीन आरोप लगाया कि इन जजों ने स्कूल प्रबंधन को अवैध रूप से बचाने के लिए भ्रष्टाचार के तहत गलत रिपोर्ट तैयार की है।
न्यायाधीश राकेश कैंथला ने अपने आदेश में इस कृत्य की कड़ी निंदा करते हुए कहा, "बिना किसी ठोस आधार या प्रमाण के, आदतन और अत्यंत गैर-जिम्मेदाराना तरीके से न्यायिक अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाना सीधे तौर पर न्यायपालिका को डराने, अपमानित करने और बदनाम करने की कोशिश है"। अदालत ने इसे प्रथम दृष्टया 'आपराधिक अवमानना' का अत्यंत गंभीर मामला माना और याचिकाकर्त्ता के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए फाइलों को तत्काल मुख्य रोस्टर बैंच के समक्ष भेजने का आदेश पारित कर दिया।