Edited By Kuldeep, Updated: 03 Sep, 2026 07:38 PM

माता बाछल की लाख मिन्नतों के बाद भी गुग्गावीर ने उनकी एक न मानी और देखते ही देखते जाहरवीर धरती में समा गए। उनकी ध्वजा और भाला ही बाहर दिख रहे थे।
डाडासीबा (सुनील): माता बाछल की लाख मिन्नतों के बाद भी गुग्गावीर ने उनकी एक न मानी और देखते ही देखते जाहरवीर धरती में समा गए। उनकी ध्वजा और भाला ही बाहर दिख रहे थे। कहा जाता है कि ददरेडा नगरी में रामा नाम के ग्वाले ने गुग्गा जी की सबसे प्यारी गाय सुरा को गोरख टिल्ले यानी जहां गुग्गा वीर समाये थे वहां दूध पिलाते देखा था ग्वाले ने यह बात गुग्गा जी की पत्नी श्रीयल को बताई इसके वाद श्रीयल ने वहां नित्य रोना-पीटना शुरू कर दिया। श्रीयल के नित्य ऐसा करने से वहां की धरती फटी और कहा जाता है कि श्रीयल भी धरती के गर्भ में समा गई। यह स्थान आज भी श्रीयल जाल के नाम से मशहूर है।
यहां कुलबधुयें, चोटी, मेहंदी, सिन्दूर, रोली, चावल आदि चढ़ा कर मनौती मांगती हैं और सौभाग्यवती होने के आशीर्वाद की वहां से धुनी निकलती है। प्रदेश के अन्दर गुग्गा पूजन का एक खास महत्व है। सर्पों व नागों का 100 मण जहर पीने के कारण उन्हें जहरपीर भी कहा जाता है। पूरे भारत वर्ष की जनता उस समय भी गुग्गा राणा को देवता की तरह पूजती थी और जब कहीं दूर किसी बस्ती में जाकर जहां भी उठती बैठती थी, उनके गुणों की गाथा खुश होकर गाया करती थी। प्राचीन समय से चली आ रही यह परम्परा आज भी उसी तरह कायम है। मुसलमान भी गुग्गावीर के चमत्कारों की गाथा सुनकर उन्हें पीर पैगम्बरों की तरह पूजते हैं।
गुग्गा जी की मैड़ी से एक रोचक घटना जुड़ी है। कहा जाता है कि दिल्ली का बादशाह नौशेबरा बगावत दबाने के कारण गुग्गा मैड़ी के रास्ते अपनी फौज लेकर निकलने लगा तो गुग्गा राणा से बादशाह नौशेबरा ने मनौती मांगी कि हे भगवान जाहरवीर अगर मैं बगावत दबाने में कामयाब हुआ तो आपके आराम के वास्ते एक आलीशान पक्की दरगाह बनाऊंगा। लेकिन कामयाबी मिलने के बाद बादशाह अपना कौल भूल गया और जैसे ही उसकी फौज मैड़ी के आगे बढ़ने लगी तो बड़े-बड़े भयंकर सर्पों को देख बादशाह नौशेबरा भयभीय हो गया। उसने पलटन को हुक्म दिया कि पीर महाराज के लिए अभी दरगाह बनवानी होगी।
कहा जाता है कि भादरा से मैड़ी भवन तक लाइन लगाकर पलटन को खड़ा कर दिया गया और गुग्गा मैड़ी भवन तैयार होते ही सभी नाग देवता धरती की गोद में समा गए। दूर-दूर से लोग इस मैड़ी भवन में अपना मस्तक नवा कर अपने-अपने घरों को लौटते हैं। उनमें से किसी की भी मृत्यु आज तक सांप के काटने से नहीं हुई है इसलिए गुग्गावीर की नागदेवता के रूप में भी आराधना की जाती है।