Shimla: सरकारी आवास आबंटन की मौजूदा व्यवस्था पूरी तरह अपारदर्शी और 'लॉटरी' जैसी : हाईकोर्ट

Edited By Kuldeep, Updated: 30 Jul, 2026 10:28 PM

shimla government accommodation allotment

प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में सरकारी आवास आबंटन की मौजूदा व्यवस्था पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए इसे पूरी तरह अपारदर्शी और 'लॉटरी' जैसा करार दिया है।

शिमला (मनोहर): प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में सरकारी आवास आबंटन की मौजूदा व्यवस्था पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए इसे पूरी तरह अपारदर्शी और 'लॉटरी' जैसा करार दिया है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल ने अमित कुमार ठाकुर द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के पश्चात सामान्य प्रशासन विभाग के एकाधिकार और ढुलमुल रवैये पर कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने साफ कहा कि इस अपारदर्शी व्यवस्था को बदलने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे और इस संबंध में जीडीए के प्रधान सचिव को पिछले आदेशानुसार निजी तौर पर हलफनामा दायर करने का आदेश दिया गया है।

पिछले आदेश में कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि "कर्मचारी सरकार के पास भीख का कटोरा लेकर क्यों जाएं?" सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार से बेहद कड़ा सवाल पूछा था कि लोक सेवा आयोग जैसी स्वतंत्र संस्थाओं के कर्मचारियों के लिए अलग से समर्पित आवास की व्यवस्था क्यों नहीं है? कोर्ट ने टिप्पणी की, "हर बार कर्मचारियों को आवासीय मकान के आबंटन के लिए जीडीए विभाग के सामने भीख का कटोरा लेकर क्यों खड़ा होना पड़ता है?" कोर्ट ने निर्देश दिया था कि आयोग जैसी स्वतंत्र संस्थाओं को कुछ समर्पित आवास सौंपे जाने चाहिए, ताकि वे अपनी जरूरत के हिसाब से खुद आबंटन कर सकें।

सरकार की ओर से जीडीए के उप सचिव से मिले निर्देशों को कोर्ट के सामने रखा गया था। सरकार का तर्क था कि हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग का कोई अलग आवास पूल नहीं है और सभी का आबंटन 1994 के सामान्य नियमों के तहत होता है। सरकार ने कहा था कि राज्य में सरकारी मकानों की भारी कमी है, इसलिए कोई भी कर्मचारी अधिकार के तौर पर आवास का दावा नहीं कर सकता। हाईकोर्ट ने सरकार की इन दलीलों पर कहा कि इसमें कुछ भी नया नहीं है। कोर्ट ने आबंटन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि जीडीए विभाग के एकाधिकार और अपारदर्शी सिस्टम के कारण किसी अधिकारी या कर्मचारी को मकान मिलना किसी लॉटरी के निकलने जैसा हो गया है।

कोर्ट ने कहा था कि हर साल सरकारी आवास के लिए नए सिरे से आवेदन मांगने का मौजूदा सिस्टम महज एक ढकोसला है, जिसे तुरंत बंद किया जाना चाहिए। पारदर्शिता लाने के लिए कोर्ट ने एक ऐसी एकल सूची बनाने का सुझाव दिया था, जो हमेशा के लिए मान्य हो। इसमें आवेदन की वरिष्ठता का ध्यान रखा जाए, मकान मिलने पर नाम हटाया जाए और नए आवेदकों के नाम नीचे जोड़े जाएं। कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि 24 जून 2026 को दिए गए इन सुझावों और आदेशों पर सरकार को तुरंत गंभीरता से विचार करना होगा। अदालत ने अब हिमाचल प्रदेश के प्रधान सचिव को खुद हलफनामा दायर कर यह बताने को कहा है कि कोर्ट की इन टिप्पणियों पर सरकार क्या कदम उठा रही है। इस मामले की अगली सुनवाई 17 अगस्त को तय की गई है, जहां सरकार को अपना जवाब पेश करना होगा।

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