Shimla: बटाड़ी पहुंचे महासू देवता अढाल, जागरा उत्सव की बढ़ी रौनक

Edited By Kuldeep, Updated: 12 Sep, 2026 09:54 PM

rohru mahasu devta

देवता महासू महाराज अढाल के बटाड़ी गांव आगमन के साथ ही अढाल के प्रसिद्ध जागरा उत्सव की तैयारियां शुरू हो गई हैं।

रोहड़ू (बशनाट): देवता महासू महाराज अढाल के बटाड़ी गांव आगमन के साथ ही अढाल के प्रसिद्ध जागरा उत्सव की तैयारियां शुरू हो गई हैं। पुरानी देव परंपरा के अनुसार अढाल के महासू देवता पहले बटाड़ी और उसके बाद कांडा गांव पहुंचकर देवता महासू बटाड़ी तथा नेवल गढ़ी के प्रसिद्ध देवता साहिब शलौंणू महाराज को जागरा उत्सव में शामिल होने का निमंत्रण देते हैं। इसी परंपरा के तहत देवता महासू महाराज बटाड़ी और देवता साहिब शलौंणू महाराज रविवार 13 सितम्बर को अढाल पहुंचकर जागरा उत्सव में शामिल होंगे। सोमवार रात 14 सितम्बर को अढाल में जागरा उत्सव की धूम रहेगी। इस दौरान देवताओं के मिलन के साथ सदियों पुरानी देव परंपराओं का निर्वहन किया जाएगा। इस दौरान अढाल, बटाड़ी और कांडा सहित आसपास के गांवों और पंचायतों से श्रद्धालु उत्सव में शामिल होते हैं।

जागरा उत्सव का धार्मिक महत्व
जागरा उत्सव हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों का प्रमुख लोक पर्व है, जो आराध्य महासू देवता को समर्पित है। हिमाचल के शिमला, सिरमौर, कुल्लू व किन्नौर सहित उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र में इसे श्रद्धा से मनाया जाता है। महासू देवता को न्याय का देवता और भगवान शिव का स्वरूप माना जाता है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाए जाने वाले जागरा का अर्थ जागरण से है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महासू देवता ने क्षेत्रवासियों को राक्षसों के आतंक से मुक्ति दिलाई थी। इसलिए यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। उत्सव के दौरान लोग सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और खुशहाली की कामना करते हैं। पैतृक गांव लौटने और देव परंपराओं में भाग लेने से यह पर्व सामाजिक एकता और भाईचारे को भी मजबूत करता है।

 

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