Edited By Swati Sharma, Updated: 24 Aug, 2026 10:15 AM

हिमाचल प्रदेश की चैल वन्यजीव अभ्यारण्य में पहली बार ‘इंडियन रोलर' देखा गया है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘नीलकंठ' कहा जाता है। वन्यजीव निगरानी के दौरान इसे देखा जाना इसलिए भी खास है क्योंकि यह अभ्यारण्य लगभग 2,100 से 2,600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह...
Shimla News : हिमाचल प्रदेश की चैल वन्यजीव अभ्यारण्य में पहली बार ‘इंडियन रोलर' देखा गया है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘नीलकंठ' कहा जाता है। वन्यजीव निगरानी के दौरान इसे देखा जाना इसलिए भी खास है क्योंकि यह अभ्यारण्य लगभग 2,100 से 2,600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह अहम जानकारी वन खंड अधिकारी नीलम ठाकुर, एफजीडी शालिंदर, एफजीडी अनूप, एफजीडी सुमित्रा और वन मित्र रूपल और मेहर ने दी।
अभ्यारण्य में दर्ज पक्षियों की विविधता में अहम बढ़ोतरी
उल्लेखनीय है कि यह अभ्यारण्य में दर्ज पक्षियों की विविधता में एक अहम बढ़ोतरी है। इंडियन रोलर को उसके शानदार नीले और फिरोजी पंखों से आसानी से पहचाना जा सकता है, जो खासकर उड़ते समय साफ दिखाई देते हैं। यह आम तौर पर मैदानी इलाकों, खुली जगहों, खेती वाली जमीन, घास के मैदानों और कम ऊंचाई वाले इलाकों में पाया जाता है। यहां इसे अक्सर पेड़ों, बिजली के तारों या ऊंची जगहों पर बैठकर कीड़े-मकोड़े और छोटे शिकार की तलाश करते हुए देखा जाता है। हिमांशु चौधरी के अनुसार, इंडियन रोलर को आम तौर पर मैदानी और कम ऊंचाई वाले इलाकों का पक्षी माना जाता है, इसलिए चैल में इसकी मौजूदगी खास तौर पर अहम है। उन्होंने कहा, 'इससे पहले हिमाचल प्रदेश के दूसरे हिस्सों, जैसे 2014 में सांगला और 2023 में काजा में अधिक ऊंचाई वाले इलाकों से इस प्रजाति के असामान्य रिकॉर्ड सामने आए थे। चैल वन्यजीव अभ्यारण्य से इस प्रजाति का हालांकि पहले कोई रिकॉडर् नहीं मिला था।' हिमाचल प्रदेश ई-बर्ड समन्वयक डॉ. माल्यश्री भट्टाचार्य ने भी पुष्टि की कि चैल वन्यजीव अभ्यारण्य से इंडियन रोलर का यह पहला ज्ञात रिकॉर्ड है। उन्होंने इस जानकारी को अहम बताया और अलग-अलग आवासों और ऊंचाई वाले इलाकों में पक्षियों की नियमित निगरानी और दस्तावेजीकरण के महत्व पर जोर दिया। ऐसे रिकॉर्ड शोधकर्ताओं को प्रजातियों के फैलाव, मौसमी आवाजाही, आवास में बदलाव और समय के साथ पक्षियों की मौजूदगी में होने वाले बदलावों को समझने में मदद करते हैं।
'हिमालयी क्षेत्र में लगातार क्षेत्र निगरानी जरूरी'
अंकुश ठाकुर ने कहा कि प्रवास के दौरान पक्षियों की आवाजाही की निगरानी से पक्षीप्रेमियों और शोधकर्ताओं को अहम मौके मिलते हैं। कभी-कभी पक्षी उन इलाकों में भी देखे जाते हैं जहां पहले कभी नहीं देखे गए थे, जिससे हिमालयी क्षेत्र में लगातार क्षेत्र निगरानी बहुत जरूरी हो जाती है। ऐसी जानकारी से प्रवास के रास्तों और आवाजाही के पैटर्न के बारे में उपयोगी जानकारी मिल सकती है। राज्य पक्षी गणना समन्वयक संतोष ठाकुर ने कहा कि नियमित और व्यवस्थित वन्यजीव निगरानी हिमाचल प्रदेश में पक्षियों की प्रजातियों का एक मजबूत डेटाबेस बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है। अलग-अलग इलाकों में लगातार सर्वेक्षण करने से लंबे समय के लिए काम के रिकॉर्ड बनाने, राज्य में पक्षियों की विविधता को बेहतर ढंग से समझने और संरक्षण की कोशिशों में मदद मिलेगी।
शिमला के डीसीएफ ने वन विभाग की टीम को दी बधाई
शिमला के डीसीएफ (वन्यजीव) डॉ. शाहनवाज ने इस जानकारी के लिए वन विभाग टीम को बधाई दी और कहा कि वन्यजीवों की निगरानी की ऐसी पहल उत्साहजनक और महत्वपूर्ण हैं। इनकी नियमित निगरानी से न केवल अभ्यारण्यों में पाई जाने वाली प्रजातियों का रिकॉर्ड रखने में मदद मिलती है बल्कि प्रवासी पक्षियों की आवाजाही और उनके व्यवहार के पैटर्न को समझने में भी योगदान मिलता है। चैल में ‘इंडियन रोलर' का देखा जाना हिमाचल प्रदेश की समृद्ध जैव-विविधता को दर्ज करने में लगातार क्षेत्र पर्यवेक्षण, नागरिक विज्ञान और व्यवस्थित वन्यजीव अध्ययन के महत्व को उजागर करता है। निचले वन क्षेत्रों से लेकर ऊंचे हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र तक फैले आवासों के कारण राज्य उन जगहों पर प्रजातियों को रिकॉर्ड करने के अवसर प्रदान करता रहता है, जहां उनकी मौजूदगी पहले दर्ज नहीं की गयी थी।