Edited By Kuldeep, Updated: 05 Sep, 2026 08:19 PM

लोक संस्कृति में कुछ ऐसी आस्थाएं हैं जो धर्म और समुदाय की सीमाओं से कहीं ऊपर उठकर लोगों को जोड़ती हैं। गोगा जाहरवीर ऐसी ही लोक आस्था के प्रतीक हैं।
डाडासीबा (सुनील): लोक संस्कृति में कुछ ऐसी आस्थाएं हैं जो धर्म और समुदाय की सीमाओं से कहीं ऊपर उठकर लोगों को जोड़ती हैं। गोगा जाहरवीर ऐसी ही लोक आस्था के प्रतीक हैं। हिंदू उन्हें गोगा जी, गुग्गा वीर और जाहरवीर के नाम से पूजते हैं, वहीं मुस्लिम समुदाय में उन्हें जाहरपीर के रूप में श्रद्धा से याद किया जाता है। लोकमान्यता है कि गोगा जी सांपों के देवता हैं और सर्पदंश से बचाव के लिए उनकी पूजा की जाती है। लोककथाओं के अनुसार गोगा जी, गुरु गोरखनाथ के प्रमुख शिष्यों में शामिल थे। गोगा देव की जन्मभूमि पर आज भी उनके घोड़े का अस्तबल है। सैंकड़ों वर्ष बीत गए, लेकिन उनके घोड़े की रकाब अभी भी वहीं पर है। उक्त जन्म स्थान पर गुरु गोरखनाथ का आश्रम भी है, वहीं है गोगा देव की घोड़े पर सवार मूर्ति। भक्तजन इस स्थान पर कीर्तन करते हुए आते हैं और जन्म स्थान पर बने मंदिर पर माथा टेककर मन्नत मांगते हैं। आज भी सर्पदंश से मुक्ति के लिए गोगा जी की पूजा की जाती है।
गोगा जी के प्रतीक के रूप में पत्थर या लकड़ी पर सर्प मूर्ति उत्कीर्ण की जाती है। हनुमानगढ़ जिले के नोहर उपखंड में स्थित गोगा जी के पावन धाम गोगामेड़ी स्थित गोगा जी का समाधि स्थल जन्म स्थान से लगभग 80 किमी की दूरी पर स्थित है जो साम्प्रदायिक सद्भाव का अनूठा प्रतीक है जहां एक हिन्दू व एक मुस्लिम पुजारी खड़े रहते हैं। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा से लेकर भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा तक गोगामेड़ी के मेले में वीर गोगा जी की समाधि तथा गोगा वीर व जाहरवीर के जयकारों के साथ गोगा जी तथा गुरु गोरखनाथ के प्रति भक्ति की अविरल धारा बहती है। गोरख टीला स्थित गुरु गोरखनाथ के धूने पर शीश नवाकर भक्तजन गोगा पीर के दरबार में मनौतियां मांगते हैं। विद्वानों व इतिहासकारों ने गोगा पीर के जीवन को शौर्य, धर्म, पराक्रम व उच्च जीवन के आदर्शों का प्रतीक माना है।
प्रदेश की लोक संस्कृति में गोगा जी के प्रति अपार आदर भाव देखते हुए कहा गया है कि गांव-गांव में खेजड़ी, गांव-गांव में गोगा वीर गोगा जी का आदर्श व्यक्तित्व भक्तजनों के लिए सदैव आकर्षण का केंद्र रहा है। जातरू ददरेवा आकर न केवल धोक आदि लगाते हैं बल्कि वहां अखाड़े (ग्रुप) में बैठकर गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य जाहरवीर गोगा जी की जीवनी के किस्से अपनी-अपनी भाषा में गाकर सुनाते हैं। प्रसंगानुसार जीवनी सुनाते समय वाद्य यंत्रों में डमरू व कांसी का कचौला विशेष रूप से बजाया जाता है। इस दौरान अखाड़े के जातरूओं में से कई जातरू अपने सिर व शरीर पर पूरे जोर से लोहे की सांकले मारते हैं। मान्यता है कि गोगा जी की संकलाई यानी पौण, चौकी आने पर ऐसा किया जाता है।