Edited By Kuldeep, Updated: 15 Jul, 2026 09:59 PM

प्रदेश हाईकोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया में मैरिट की अनदेखी करने पर कड़ा रुख अपनाते हुए माना कि चयन बोर्ड द्वारा अधिक अंक वाले उम्मीदवार को उसकी पसंद की बजाय दूसरे विभाग में भेजना और कम अंक वालों को सचिवालय आबंटित करना....
शिमला (मनोहर): प्रदेश हाईकोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया में मैरिट की अनदेखी करने पर कड़ा रुख अपनाते हुए माना कि चयन बोर्ड द्वारा अधिक अंक वाले उम्मीदवार को उसकी पसंद की बजाय दूसरे विभाग में भेजना और कम अंक वालों को सचिवालय आबंटित करना पूरी तरह से अवैध और भेदभावपूर्ण था। चूंकि याचिकाकर्त्ता अब सेवानिवृत्त हो चुका है, इसलिए कोर्ट ने उसे नियुक्ति की तारीख से नोशनल लाभ और सेवानिवृत्ति के बाद से वास्तविक वित्तीय लाभ देने के निर्देश दिए हैं। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज ने याचिकाकर्त्ता राजन चौहान की याचिका का निपटारा करते हुए यह आदेश जारी किए।
याचिकाकर्त्ता राजन चौहान, जो स्वास्थ्य विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे, ने साल 2010 में सीमित सीधी भर्ती के तहत क्लर्क पद के लिए आवेदन किया था। उसने लिखित परीक्षा और साक्षात्कार में 152 अंक प्राप्त किए और मैरिट सूची में उसका स्थान काफी ऊपर था। उसने सचिवालय प्रशासन विभाग में नियुक्ति की इच्छा जताई थी, लेकिन बोर्ड ने उसे आयुर्वेद विभाग आबंटित कर दिया। इसके विपरीत, जिन उम्मीदवारों के अंक क्रमशः 119 और 106 थे और जो पहली बार में टाइपिंग टैस्ट भी पास नहीं कर पाए थे, उन्हें दोबारा मौका देकर सचिवालय में क्लर्क नियुक्त कर दिया गया।
बोर्ड द्वारा इसके प्रतिवेदन पर कोई कार्रवाई न किए जाने पर याचिकाकर्त्ता ने अदालत का रुख किया। हाईकोर्ट ने रिट याचिका का निपटारा करते हुए आदेश दिया कि याचिकाकर्त्ता को सचिवालय प्रशासन विभाग में क्लर्क के रूप में कार्यरत माना जाए। उसे सेवानिवृत्ति की तिथि (31 मई 2026) तक सभी सेवा लाभ नोशनल आधार पर और उसके बाद की पैंशन व अन्य बकाया वास्तविक आधार पर दिए जाएं। कोर्ट ने सरकार को सभी वित्तीय बकाया का भुगतान 3 महीने के भीतर करने का निर्देश दिया है, ऐसा न करने पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देय होगा।