Edited By Kuldeep, Updated: 29 Sep, 2026 09:03 PM

प्रदेश हाईकोर्ट ने तलाक के एक मामले में पति की याचिका खारिज करते हुए टिप्पणी की है कि पत्नी को शौचालय का इस्तेमाल करने से रोकना और उसे गौशाला में रहने को मजबूर करना क्रूरता की श्रेणी में आता है।
शिमला (मनोहर): प्रदेश हाईकोर्ट ने तलाक के एक मामले में पति की याचिका खारिज करते हुए टिप्पणी की है कि पत्नी को शौचालय का इस्तेमाल करने से रोकना और उसे गौशाला में रहने को मजबूर करना क्रूरता की श्रेणी में आता है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश योगेश जसवाल की खंडपीठ ने मंडी की फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसने पति की तलाक की अर्जी को खारिज कर दिया था।
याचिकाकर्त्ता पति, जो पेशे से फिजिकल एजुकेशन टीचर है, ने अपनी पत्नी पर क्रूरता और परित्याग का आरोप लगाते हुए हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक मांगा था। उसने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी 23 साल से अलग रह रही थी और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियां नहीं निभा रही थी। मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया कि पति खुद एक नए और बड़े मकान में रह रहा था, जबकि उसने अपनी पत्नी को उसी परिसर के एक पुराने कमरे/गौशाला में रहने के लिए मजबूर कर रखा था।
इतना ही नहीं, पति ने पत्नी को घर के शौचालय और वॉशरूम का इस्तेमाल करने पर भी रोक लगा दी थी, जिसके लिए पुलिस में समझौता भी हुआ था। हाईकोर्ट ने कहा कि अपनी ही पत्नी को बुनियादी मानवीय सुविधाओं और शौचालय के इस्तेमाल से रोकना गरिमा के खिलाफ है और यह पति द्वारा की गई असली क्रूरता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति खुद गलत काम करके उसका फायदा नहीं उठा सकता। हाईकोर्ट ने पाया कि पत्नी अपनी मर्जी से अलग नहीं रह रही थी, बल्कि पति के व्यवहार के कारण उसे ऐसा करना पड़ा।