Shimla: सेवानिवृत्त वैज्ञानिक के हक के एरियर रोकने पर कृषि विश्वविद्यालय को 50 हजार का हर्जाना

Edited By Kuldeep, Updated: 14 Oct, 2026 10:26 PM

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हाईकोर्ट ने कृषि विश्वविद्यालय सीएसकेएचपीकेवी पालमपुर द्वारा एक सेवानिवृत्त वैज्ञानिक के हक के एरियर रोकने पर कड़ा रुख अपनाया है।

शिमला (मनोहर): हाईकोर्ट ने कृषि विश्वविद्यालय सीएसकेएचपीकेवी पालमपुर द्वारा एक सेवानिवृत्त वैज्ञानिक के हक के एरियर रोकने पर कड़ा रुख अपनाया है। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ ने याचिकाकर्त्ता डॉ. पूनम की याचिका को स्वीकार करते हुए विश्वविद्यालय को 18,60,374 रुपए का एरियर 6 प्रतिशत ब्याज के साथ भुगतान करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने लापरवाही के लिए यूनिवर्सिटी पर 50,000 रुपए का हर्जाना (कॉस्ट) भी लगाया है। कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को 9 नवम्बर तक या उससे पहले पूरा करने की सख्त समय-सीमा तय की है।

डॉ. पूनम अगस्त 1991 में सहायक वैज्ञानिक के रूप में विश्वविद्यालय में शामिल हुई थीं और जनवरी 2023 में 'ऑल इंडिया को-आर्डीनेटर रिसर्च प्रोजैक्ट ऑन एग्रोफॉरेस्ट्री' में प्रधान वैज्ञानिक के पद से सेवानिवृत्त हुईं। 7वें केंद्रीय वेतन आयोग के तहत उनके वेतन संशोधन का 18,60,374 रुपए का एरियर बकाया था।

इस प्रोजैक्ट के लिए 75 प्रतिशत बजट केंद्रीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा और शेष 25 प्रतिशत राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाता है। विश्वविद्यालय की मांग पर केंद्रीय एजैंसी ने मार्च 2023 में ही डॉ. पूनम सहित अन्य कर्मचारियों के एरियर के लिए 45 लाख रुपए का फंड जारी कर दिया था। केंद्रीय एजैंसी ने यह स्पष्ट निर्देश दिया था कि इस राशि का उपयोग केवल वित्तीय वर्ष 2022-23 के दौरान बकाया एरियर चुकाने के लिए ही किया जाए।

फंड मिलने के बावजूद विश्वविद्यालय ने डॉ. पूनम को उनके एरियर का भुगतान नहीं किया। इसके बजाय, कुलपति ने अपने विशेषाधिकारों का हवाला देते हुए इस राशि को यूनिवर्सिटी के सेंट्रलाइज्ड फंड स्कीम खाते में जमा करवा दिया। हैरान करने वाली बात यह है कि यूनिवर्सिटी ने 29 अप्रैल 2023 को फंडिंग एजैंसी को 'यूटिलाइजेशन सर्टीफिकेट' (उपयोगिता प्रमाण पत्र) भी भेज दिया, जिसमें झूठा दावा किया गया कि राशि का उपयोग उसी काम के लिए किया जा चुका है जिसके लिए वह जारी की गई थी।

जब सेवानिवृत्त वैज्ञानिक ने एरियर के लिए गुहार लगाई तो विश्वविद्यालय ने यह कहकर टाल दिया कि राज्य सरकार से निर्देश मिलने के बाद ही भुगतान किया जाएगा। इसके बाद पीड़ित वैज्ञानिक को न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। सुनवाई के दौरान प्रदेश सरकार के वित्त विभाग ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार ने यूनिवर्सिटी को आईसीएआर से प्राप्त 75 प्रतिशत हिस्से के भुगतान को रोकने का कोई निर्देश नहीं दिया था। राज्य सरकार की बंदिशें केवल उसके अपने 25 प्रतिशत वित्तीय हिस्से पर लागू होती हैं, न कि केंद्र से प्राप्त फंड पर।

हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय के इस रवैये को अत्यंत हैरान करने वाला और गैर-कानूनी करार दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि जब केंद्रीय एजैंसी से किसी खास काम के लिए पैसा मिला था तो विश्वविद्यालय के पास उसे रोकने या अपने दूसरे खाते में ट्रांसफर करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था। कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्त्ता को मानसिक प्रताड़ना देने के लिए यूनिवर्सिटी 50,000 रुपए का हर्जाना भरे।

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