Edited By Kuldeep, Updated: 14 Oct, 2026 10:21 PM

प्रदेश हाईकोर्ट ने सड़क निर्माण के लिए बिना अधिग्रहण और बिना मुआवजा दिए नागरिक की निजी भूमि का उपयोग करने के मामले में स्पष्ट किया है कि एक सह-मालिक को अन्य सह-मालिकों की सहमति के बिना अनापत्ति प्रमाण पत्र देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है और...
शिमला (मनोहर): प्रदेश हाईकोर्ट ने सड़क निर्माण के लिए बिना अधिग्रहण और बिना मुआवजा दिए नागरिक की निजी भूमि का उपयोग करने के मामले में स्पष्ट किया है कि एक सह-मालिक को अन्य सह-मालिकों की सहमति के बिना अनापत्ति प्रमाण पत्र देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है और म्यूटेशन में गलती के कारण किसी नागरिक का मालिकाना हक खत्म नहीं होता।
न्यायाधीश संदीप शर्मा की एकल पीठ ने याचिकाकर्त्ता बलि राम की ओर से दायर याचिका का निपटारा करते हुए प्रतिवादी राज्य सरकार सहित प्राधिकारी को 2 महीने के भीतर भूमि का सीमांकन कर अधिग्रहण प्रक्रिया पूरी करने और उचित मुआवजा प्रदान करने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार किसी नागरिक की भूमि का उपयोग बिना उचित मुआवजा दिए नहीं कर सकती और न ही देरी के आधार पर उसके अधिकार को छीना जा सकता है।
याचिकाकर्त्ता बलि राम का आरोप था कि सिरमौर जिले की तहसील शिलाई में 'लानी से बोरड़' सड़क (4/900 से 4/945 किमी) के निर्माण के लिए उनकी भूमि (मोहाल बोरड़) का उपयोग वर्ष 2008 में किया गया था। भूमि का उपयोग किए जाने के बावजूद सरकार ने न तो इसके अधिग्रहण की कार्रवाई की और न ही उन्हें आज तक कोई मुआवजा दिया।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने स्वीकार किया कि सड़क निर्माण के लिए याचिकाकर्त्ता की भूमि का उपयोग किया गया है। हालांकि सरकार ने मुआवजे के दावे को खारिज किया। दलील दी गई कि सड़क निर्माण/अधिग्रहण के समय याचिकाकर्त्ता का नाम जमाबंदी में दर्ज नहीं था, बल्कि उनका नाम 2023 में दर्ज हुआ। याचिकाकर्त्ता के भाई (तुलसी राम) ने 15 जून, 2007 को सड़क निर्माण के लिए एनओसी दिया था। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के एन.ओ.सी. वाले तर्क को सिरे से खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि यद्यपि याचिकाकर्त्ता के भाई तुलसी राम एक सह-मालिक हैं, लेकिन उन्हें अन्य सह-मालिकों की ओर से एनओसी देने का कोई अधिकार नहीं था। वह केवल अपने हिस्से की भूमि के लिए सहमति दे सकते थे, अन्य सह-मालिकों के हिस्से के लिए नहीं। रिकॉर्ड के अनुसार याचिकाकर्त्ता की मां का निधन 8 मई 2005 को हुआ था, जिसके बाद याचिकाकर्त्ता भी अन्य वारिसों के साथ संपत्ति के बराबर के हकदार बन गए थे।
वर्ष 2009 के म्यूटेशन के दौरान पटवारी की चूक के कारण याचिकाकर्त्ता का नाम छूट गया था, जिसे बाद में संबंधित पटवारी की रिपोर्ट (18 मई 2026) द्वारा स्पष्ट कर दिया गया। न्यायालय ने माना कि अधिग्रहण के समय याचिकाकर्त्ता वास्तव में भूमि के कानूनी सह-मालिक थे।