Edited By Vijay, Updated: 09 Jun, 2026 12:59 PM

समाज में अंगदान के प्रति जागरूकता की अलख जगाने के लिए हिमाचल प्रदेश के जिला हमीरपुर जिले के बडैहर गांव के रहने वाले साहसिक ट्रैकर अनिल कुमार ने एक ऐतिहासिक और अनूठी पहल की है।
मनाली: समाज में अंगदान के प्रति जागरूकता की अलख जगाने के लिए हिमाचल प्रदेश के जिला हमीरपुर जिले के बडैहर गांव के रहने वाले साहसिक ट्रैकर अनिल कुमार ने एक ऐतिहासिक और अनूठी पहल की है। जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे लोगों को जीवनदान दिलाने के मकसद से, अनिल मनाली से लेह तक की लगभग 500 किलोमीटर लंबी और बेहद खतरनाक दूरी पैदल ही नापने निकल पड़े हैं।
माता हिडिंबा का आशीर्वाद लेकर किया शंखनाद
अनिल कुमार ने बीते सोमवार को मनाली स्थित ऐतिहासिक हिडिंबा देवी मंदिर में माथा टेका और माता का आशीर्वाद लेकर अपनी इस साहसिक यात्रा का औपचारिक रूप से शंखनाद किया। ट्रैकर अनिल ने बताया कि उन्होंने करीब एक महीने पहले इस कठिन और चुनौतीपूर्ण यात्रा का प्रण लिया था।
रोजाना करेंगे 20 से 25 किलोमीटर का सफर
इस दुर्गम यात्रा का रोडमैप बेहद चुनौतीपूर्ण है। अनिल का लक्ष्य इस खतरनाक पहाड़ी मार्ग पर रोजाना 20 से 25 किलोमीटर पैदल चलना है, ताकि वे अगले 25 दिनों में अपना सफर पूरा कर सकें। उनकी यह पदयात्रा मनाली से शुरू होकर केलांग, जिस्पा, दारचा और सरचू जैसे बर्फीले और कठिन पहाड़ी इलाकों से गुजरते हुए लेह पहुंचेगी। लेह पहुंचने पर अनिल कुमार 'हॉल ऑफ फेम' जाएंगे, जहां वे देश की रक्षा में अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित कर अपनी यात्रा का समापन करेंगे।
स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत पत्नी से मिली प्रेरणा
अनिल कुमार के इस जज्बे के पीछे उनकी पत्नी की अहम भूमिका है, जो स्वयं स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत हैं। उन्हीं से प्रेरित होकर अनिल ने देश और समाज की सेवा के लिए यह कदम उठाया है। वह खुद भी एक पंजीकृत अंगदाता हैं।
'लाखों लोग जीना चाहते हैं, लेकिन...'
इस अभियान को शुरू करने के पीछे की विडंबना और दर्द को सांझा करते हुए अनिल कुमार ने कहा कि आज दुनिया में लाखों लोग ऐसे हैं जो जीना चाहते हैं, लेकिन समय पर अंग न मिल पाने के कारण वे असमय ही मौत के मुंह में समा जाते हैं। उन्होंने कहा कि हमारे समाज में आज भी अंगदान को लेकर जागरूकता की भारी कमी है, जिस कारण लोग चाहकर भी इस पुनीत कार्य के लिए खुलकर आगे नहीं आ पाते हैं। इसी झिझक को तोड़ने के लिए उन्होंने इस 500 किलोमीटर के सफर को चुना है।
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