कारगिल विजय दिवस: चम्बा में गूंजी कैप्टन विक्रम बत्रा की शौर्य गाथा, राज्यपाल ने शहीदों को दी श्रद्धांजलि

Edited By Vijay, Updated: 26 Jul, 2026 03:24 PM

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कारगिल विजय दिवस के अवसर पर ऐतिहासिक चम्बा चौगान में एक भावपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस मौके पर राज्यपाल कविंद्र गुप्ता ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की और देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले अमर शहीदों को पुष्प अर्पित कर...

चम्बा (रणवीर): कारगिल विजय दिवस के अवसर पर ऐतिहासिक चम्बा चौगान में एक भावपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस मौके पर राज्यपाल कविंद्र गुप्ता ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की और देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले अमर शहीदों को पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। कार्यक्रम में कारगिल के नायकों की शौर्य गाथाओं को याद किया गया, जिसने वहां मौजूद हर शख्स का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया।

चम्बा के तीन सपूतों ने दिया था सर्वोच्च बलिदान
सैनिक कल्याण कार्यालय चम्बा के कार्यकारी उप निदेशक कैप्टन तिलक राज धीमान ने कारगिल युद्ध में जिले के योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान चम्बा जिले के 3 वीर जवानों ने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। इनमें 5 जून 1999 को गोला सिहुंता के खेम राज, 1 अगस्त 1999 को खरगट सिहुंता के ओम प्रकाश और 26 सितम्बर 1999 को बकलोह तुनुहट्टी के आशीष थापा वीरगति को प्राप्त हुए थे।

धन्य हैं वे माता-पिता, जिनके बच्चों ने देश के लिए दिया बलिदान : राज्यपाल
कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल कविंद्र गुप्ता ने सेना से सेवानिवृत्त हुए अधिकारियों और कर्मचारियों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया। शहीदों के बलिदान को याद करते हुए राज्यपाल ने कहा कि वे माता-पिता धन्य हैं, जिनके बच्चे देश की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए हैं। उनका यह बलिदान राष्ट्र हमेशा याद रखेगा। इस दौरान मंच से प्रस्तुत किए गए देशभक्ति पर आधारित एकल व समूह गानों ने पूरे माहौल को भावुक और गमगीन कर दिया।

पाकिस्तानी सेना में था कैप्टन विक्रम बत्रा का खौफ
मंच से परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा की वीरता को विशेष रूप से याद किया गया। बताया गया कि रणभूमि में उनकी दहाड़ से पाकिस्तानी सेना घबरा जाती थी। 1 जून 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया था। हंप और रॉकी नैब जैसे दुर्गम स्थानों पर विजय प्राप्त करने के बाद, युद्ध के मैदान में ही उन्हें कैप्टन के पद पर प्रमोट कर दिया गया था। इसके बाद श्रीनगर-लेह मार्ग की सबसे महत्वपूर्ण और सामरिक चोटी 5140 को पाकिस्तानी सेना के कब्जे से मुक्त कराने की अहम जिम्मेदारी भी कैप्टन विक्रम बत्रा को ही सौंपी गई थी।

527 में से 52 शहादतें देकर देवभूमि बन गई वीरभूमि
कार्यक्रम में जानकारी दी गई कि 25 मई से 26 जुलाई 1999 के बीच पाकिस्तान के साथ लड़े गए इस भीषण कारगिल युद्ध में देश के 527 वीर सपूतों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। यह हिमाचल प्रदेश के लिए अदम्य साहस और गौरव की बात है कि इन 527 शहीदों में से 52 वीर सपूत अकेले हिमाचल प्रदेश के थे। यही कारण है कि हिमाचल प्रदेश को देवभूमि के साथ-साथ वीरभूमि के नाम से भी जाना जाता है।

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