Edited By Swati Sharma, Updated: 30 Oct, 2026 11:06 AM

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने गुरुवार को नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) से खास जवाब मांगा कि उसने शिमला बाईपास के लिए सरफेस हाईवे बनाने का ओरिजिनल प्लान क्यों छोड़ दिया और इसके बजाय ट्विन टनल का ऑप्शन क्यों चुना, जबकि उसने पहले के प्रोजेक्ट के...
Shimla News : हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने गुरुवार को नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) से खास जवाब मांगा कि उसने शिमला बाईपास के लिए सरफेस हाईवे बनाने का ओरिजिनल प्लान क्यों छोड़ दिया और इसके बजाय ट्विन टनल का ऑप्शन क्यों चुना, जबकि उसने पहले के प्रोजेक्ट के लिए जमीन एक्वायर कर ली थी और करीब 600 करोड़ रुपये का कम्पेनसेशन दे दिया था।
17 नवंबर को होगी अगली सुनवाई
जस्टिस संदीप शर्मा ने संजौली के आठ लोगों की पिटीशन पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, हिमाचल प्रदेश सरकार, NHAI और शिमला के डिप्टी कमिश्नर समेत अन्य को नोटिस जारी कर दो हफ्ते के अंदर जवाब देने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी। याचिकाकर्ताओं ने शिमला बाईपास प्रोजेक्ट के पैकेज नंबर 2 के तहत ट्विन-ट्यूब चलौथी-संजौली-भट्टा कुफर टनल का कंस्ट्रक्शन तुरंत रोकने के निर्देश मांगे हैं। उनका आरोप है कि खुदाई और टनल बनाने से टनल के अलाइनमेंट के ऊपर बनी रिहायशी इमारतों को स्ट्रक्चरल नुकसान हुआ है। सुनवाई के दौरान, एनएचएआई (NHAI) के वकील ने कोर्ट को बताया कि टनल बनाने का काम 18 सितंबर को रोक दिया गया था और जब तक आईआईटी (IIT) रुड़की की एक्सपर्ट टीम सुरक्षा पहलुओं पर अपनी रिपोर्ट जमा नहीं कर देती, तब तक यह फिर से शुरू नहीं होगा। वकील ने आगे कहा कि IIT रुड़की की टीम ने साइट का दौरा किया था और टनल बनाने से जुड़े रिकॉर्ड मंगाए थे। उन्होंने कहा कि एनएचएआई काम फिर से शुरू करने से पहले रिहायशी इमारतों को किसी भी और नुकसान से बचाने के लिए ज़रूरी कदम उठाएगा।
बयान पर ध्यान देते हुए, कोर्ट ने कहा कि एनएचएआई को टनल बनाने का काम तुरंत रोकने का निर्देश देने में कोई रुकावट नहीं दिख रही है, खासकर तब जब अथॉरिटी ने खुद कहा था कि एक्सपर्ट रिपोर्ट मिलने तक काम रुका रहेगा। हालांकि, कोर्ट ने कोई फॉर्मल रोक लगाने से मना कर दिया, और उम्मीद और भरोसा जताया कि अगली सुनवाई तक कोई और कंस्ट्रक्शन एक्टिविटी नहीं की जाएगी। अपने डिटेल्ड ऑर्डर में, कोर्ट ने कहा, "यह कोर्ट रोक लगाने का ऑर्डर देने से खुद को रोकती है, लेकिन निश्चित रूप से उम्मीद और भरोसा करती है कि सुनवाई की अगली तारीख तक, जहां तक ट्विन टनल के कंस्ट्रक्शन का सवाल है, कोई और कंस्ट्रक्शन एक्टिविटी नहीं की जाएगी।" कोर्ट ने NHAI को यह भी निर्देश दिया कि वह अपने जवाब में साफ तौर पर बताए कि उसने जमीन एक्वायर करने और प्रभावित जमीन मालिकों और बेघर परिवारों को काफी मुआवजा देने के बाद छकरैल, भट्टा कुफर और ढल्ली से होकर जाने वाले ओरिजिनल सरफेस हाईवे अलाइनमेंट को क्यों छोड़ दिया। इसने सरफेस हाईवे के लिए ओरिजिनली प्रपोज्ड जमीन के मुआवजे के तौर पर हुए लगभग 600 करोड़ रुपये के खर्च पर एक्सप्लेनेशन मांगा और NHAI से कोर्ट को यह बताने को कहा कि खर्च हुई रकम के लिए सरकारी खजाने को कौन मुआवजा देगा।
पिटीशनर्स ने दलील दी है कि NH-05 पर ओरिजिनल शिमला बाईपास प्रोजेक्ट में ट्विन टनल की सोच नहीं थी और इसे छकरैल, भट्टा कुफर और ढल्ली से होकर एक सरफेस हाईवे के तौर पर बनाने का प्रपोजल था। याचिका के मुताबिक, एनएचएआई ने प्रस्तावित हाईवे के लिए ज़मीन खरीदी थी और ज़मीन मालिकों और घर मालिकों के बीच करीब 600 करोड़ रुपये का मुआवज़ा बांटा था। अधिग्रहण के बाद उनके घर गिराए जाने से करीब 88 परिवार पहले ही बेघर हो चुके थे। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि एनएचएआई ने बाद में बिना किसी सही वजह के सरफेस हाईवे का प्रस्ताव छोड़ दिया और संजौली में चलौथी से भट्टा कुफर तक जुड़वां सुरंगें बनाने का फैसला किया। उन्होंने आगे कहा कि सुरंग बनाने के दौरान कई घरों में दरारें आ गईं और याचिकाकर्ताओं के कुछ घरों को हाल ही में असुरक्षित घोषित कर दिया गया था। आस-पास की कम से कम 16 इमारतों को कथित तौर पर इसी तरह का स्ट्रक्चरल नुकसान हुआ है, जिससे शिमला के घनी आबादी वाले इलाके में रहने वाले करीब 1,000 परिवारों में चिंता बढ़ गई है।
याचिकाकर्ताओं ने जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) के जारी किए गए डॉक्यूमेंट्स का भी हवाला दिया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि एजेंसी ने जियोलॉजिकल और सुरक्षा चिंताओं, खासकर प्रस्तावित अलाइनमेंट के ऊपर बड़ी संख्या में घरों की मौजूदगी के कारण पहाड़ी के बीच सुरंग बनाने के खिलाफ सलाह दी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि NHAI ने प्रोजेक्ट पर काम करते समय एडवाइजरी को नज़रअंदाज़ किया। याचिका में आगे बताया गया कि कंस्ट्रक्शन के दौरान टनल के दोनों तरफ से पानी निकल रहा था, लोगों के मुताबिक, GSI ने भी इस चिंता को बताया था। GSI की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए, पिटीशनर्स ने कहा कि कुछ जगहों पर टनल और उसके ऊपर की ज़मीन के बीच की दूरी सिर्फ़ 14 मीटर थी, जिसमें कब्रिस्तान और एक शॉपिंग मार्ट के पास के इलाके शामिल हैं, जहाँ कई रेजिडेंशियल स्ट्रक्चर बने हुए हैं।