Edited By Vijay, Updated: 30 Aug, 2026 03:00 PM

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में पशुओं में फैले लंपी स्किन डिजीज का प्रकोप अब धीरे-धीरे नियंत्रण में आने लगा है। वायरस के मामलों में कमी आने से पशुपालकों और पशुपालन विभाग ने बड़ी राहत की सांस ली है।
बिलासपुर (बंशीधर): हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में पशुओं में फैले लंपी स्किन डिजीज का प्रकोप अब धीरे-धीरे नियंत्रण में आने लगा है। वायरस के मामलों में कमी आने से पशुपालकों और पशुपालन विभाग ने बड़ी राहत की सांस ली है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार जिले में अब तक कुल 131 पशु इस खतरनाक वायरस की चपेट में आए हैं, जिनमें से 5 पशुओं की मौत हो चुकी है। हालांकि, राहत की बात यह है कि 76 पशु उचित उपचार के बाद पूरी तरह स्वस्थ हो चुके हैं, जबकि वर्तमान में करीब 50 पशुओं का इलाज जारी है। पशुपालन विभाग प्रभावित क्षेत्रों में लगातार निगरानी रखे हुए है।
7,371 पशुओं का किया जा चुका है टीकाकरण
वायरस के प्रसार को रोकने और पशुओं को सुरक्षित करने के लिए पशुपालन विभाग ने युद्ध स्तर पर टीकाकरण अभियान छेड़ा हुआ है। विभाग ने जिले भर में 17,079 संवेदनशील पशुओं के टीकाकरण का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसमें से अब तक 7,371 पशुओं को वैक्सीन लगाई जा चुकी है। विभागीय अधिकारियों का प्रयास है कि लक्षित पशुओं का जल्द से जल्द टीकाकरण पूरा किया जाए, ताकि संक्रमण की चेन को पूरी तरह से तोड़ा जा सके।
मक्खी-मच्छरों से फैलता है संक्रमण
लंपी स्किन डिजीज एक अत्यधिक संक्रामक वायरल बीमारी है, जो मुख्य रूप से गाय और भैंस को अपना शिकार बनाती है। यह बीमारी खून चूसने वाले कीटों, विशेषकर मक्खी, मच्छरों और टिक्स (चिंचड़) के माध्यम से एक पशु से दूसरे पशु में फैलती है।
ये हैं मुख्य लक्षण
- पशु को अचानक तेज बुखार आना।
- सिर, गर्दन, पैर, थन और जननांगों के आसपास त्वचा पर गोल उभरी हुई गांठें बनना।
- आंख और नाक से लगातार पानी बहना।
- भूख कम लगना, अत्यधिक कमजोरी और मुंह से लार टपकना।
- दूध उत्पादन में अचानक और भारी कमी आना।
बीमारी का विशिष्ट इलाज नहीं, बचाव और आइसोलेशन अहम
पशु चिकित्सकों के अनुसार, लंपी एक वायरल बीमारी है, इसलिए इसका कोई सीधा एंटीवायरल इलाज उपलब्ध नहीं है। संक्रमित पशु को डॉक्टर की निगरानी में सहायक उपचार दिया जाता है। विभाग ने पशुपालकों को सलाह दी है कि लक्षण दिखने पर संक्रमित पशु को तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग कर दें। पशु को पर्याप्त पानी और अच्छा पोषण दें तथा त्वचा पर बने घावों की साफ-सफाई रखें। घावों में किसी अन्य इंफेक्शन को रोकने के लिए पशु चिकित्सक की सलाह से दवाएं दी जानी चाहिए। साथ ही गोशाला के आसपास साफ-सफाई रखना और मक्खी-मच्छरों को पनपने से रोकना बेहद जरूरी है।
क्या कहते हैं अधिकारी
जिले में अब तक इस वायरस की चपेट में आए 76 पशु ठीक हो चुके हैं, जबकि पांच की दुखद मौत हुई है। पशुपालन विभाग पशुपालकों को इस वायरस के प्रति लगातार जागरूक कर रहा है और टीकाकरण अभियान जोरों पर है। वर्तमान में स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में है।
- डॉ. सतीश कपूर, उपनिदेशक, पशुपालन विभाग बिलासपुर