Shimla: उच्च न्यायालय ने दिए अंशकालिक सेवा को भी पैंशन के लिए गिने जाने के आदेश

Edited By Kuldeep, Updated: 07 Apr, 2026 09:05 PM

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प्रदेश उच्च न्यायालय ने अंशकालिक सेवा को भी पैंशन के लिए गिने जाने के आदेश पारित किए हैं। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल ने कुलदीप सिंह की याचिका को मंजूर करते हुए यह फैसला सुनाया है।

शिमला (मनोहर): प्रदेश उच्च न्यायालय ने अंशकालिक सेवा को भी पैंशन के लिए गिने जाने के आदेश पारित किए हैं। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल ने कुलदीप सिंह की याचिका को मंजूर करते हुए यह फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्त्ता 10 वर्ष की अंशकालिक सेवा पूर्ण करने पर नियमितीकरण या पदोन्नति का हकदार था। याचिकाकर्त्ता को अंशकालिक सेवा के 12 वर्ष बाद दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी में परिवर्तित किया गया है।

विभाग ने अंशकालिक जल वाहक के रूप में 10 वर्ष की सेवा पूर्ण करने पर याचिकाकर्त्ता को नियमितीकरण के अधिकार से वंचित कर दिया और विशेष रूप से इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए उसने अंशकालिक जल वाहक के रूप में याचिकाकर्त्ता ने प्रत्येक कैलेंडर वर्ष में 240 दिनों से अधिक कार्य किया था। उसे विभाग की इस चूक के लिए दंडित नहीं किया जा सकता।

यदि याचिकाकर्त्ता को अंशकालिक जल वाहक के रूप में 10 वर्ष की सेवा पूर्ण करने पर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में नियमित या पदोन्नत कर दिया गया होता, तो वह पैंशन प्राप्त करने का पात्र होता। उसके नियमितीकरण/पदोन्नति में 2 वर्ष से अधिक की देरी के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है कि नियमितीकरण के बाद 10 वर्ष की सेवा पूर्ण न होने के कारण याचिकाकर्त्ता को पैंशन के लाभ से वंचित कर दिया गया है।

कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट की खंडपीठ के निर्णय के अनुसार याचिकाकर्त्ता को चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में नियमित या पदोन्नत न करने का प्रतिवादियों का कार्य विधिवत रूप से गलत है। कोर्ट ने आदेश दिए कि विभाग याचिकाकर्त्ता को अंशकालिक जल वाहक के रूप में 10 वर्ष की सेवा पूरी करने की तिथि से बिना किसी वित्तीय लाभ आदि के सांकेतिक नियमितीकरण या पदोन्नति प्रदान करे, ताकि याचिकाकर्त्ता पैंशन के लिए पात्र हो सके।

प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्त्ता को उसकी सेवानिवृत्ति की तिथि से कानून के अनुसार पैंशन प्रदान करें। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अंशकालिक जल वाहक के रूप में दी सेवा को पैंशन पात्रता के लिए भी ध्यान में रखा जाए। बकाया राशि का भुगतान 3 महीने के भीतर किया जाए। अन्यथा निर्णय की तिथि से 6 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज लगेगा।

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