Edited By Vijay, Updated: 12 Sep, 2026 01:27 PM

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कसौली के एक नामी होटल में कथित सामूहिक दुष्कर्म के मामले में पुलिस द्वारा दाखिल की गई कैंसिलेशन (क्लोजर) रिपोर्ट को वैध ठहराया है।
शिमला (मनोहर): हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कसौली के एक नामी होटल में कथित सामूहिक दुष्कर्म के मामले में पुलिस द्वारा दाखिल की गई कैंसिलेशन (क्लोजर) रिपोर्ट को वैध ठहराया है। न्यायाधीश राकेश कैंथला की पीठ ने कथित पीड़िता (याचिकाकर्ता) की पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि बिना विश्वसनीय साक्ष्य और चश्मदीद गवाह के मुकर जाने की स्थिति में महज शिकायतकर्ता के हलफनामे पर आरोपियों को सम्मन जारी करना न्यायसंगत नहीं है।
क्या है पूरा मामला?
अदालत के समक्ष रखे गए तथ्यों के अनुसार याचिकाकर्ता ने 13 दिसम्बर 2024 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि 3 जुलाई 2023 को कसौली के एक होटल में मोहन लाल बड़ौली और रॉकी मित्तल नामक दो व्यक्तियों ने उसे औरो उसकी सहेली को नशीला पदार्थ पिलाकर उसके साथ दुष्कर्म किया और घटना का वीडियो भी बनाया। पुलिस ने इस मामले की गहन जांच की, लेकिन घटना को साबित करने वाले कोई भी साक्ष्य नहीं मिले। साक्ष्यों के अभाव में पुलिस ने कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल की, जिसे 8 जनवरी 2026 को कसौली की अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मैजिस्ट्रेट की अदालत ने स्वीकार कर लिया था। इसी फैसले को याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
सहेली की गवाही ने पलटा मामला
इस मामले में सबसे अहम तथ्य यह रहा कि याचिकाकर्ता ने जिस सहेली को घटना के समय मौजूद होने का दावा किया था, उसने मैजिस्ट्रेट के सामने आरोपों को पूरी तरह नकार दिया। सहेली ने अपने बयान में कहा कि ऐसी कोई भी घटना घटित नहीं हुई थी। इसके विपरीत, उसने यह खुलासा किया कि याचिकाकर्ता और उसके नियोक्ता ने उसे मामले में झूठी गवाही देने के लिए पैसों का प्रलोभन दिया था।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुनवाई के दौरान न्यायाधीश राकेश कैंथला ने कहा कि यद्यपि न्याय प्रणाली में यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़िता के बयानों को प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन हर मामले का मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जब कहानी पूरी तरह से तर्कहीन प्रतीत हो, मुख्य चश्मदीद गवाह अपने दावों का खंडन कर रहा हो और एफआईआर प्रथम दृष्टया प्रतिशोध की भावना से प्रेरित लगे, तो ऐसी स्थिति में बिना किसी ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य के आरोपियों को अदालत में घसीटना कानूनन गलत होगा। इन तथ्यों और चश्मदीद गवाह के बयानों को आधार मानते हुए हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया और याचिकाकर्ता की पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया।
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