Edited By Kuldeep, Updated: 20 Sep, 2026 08:42 PM

सदियों से चली आ रही धार्मिक एवं पारंपरिक मान्यताओं का निर्वहन करते हुए शिव चेलों ने मणिमहेश से वापसी हड़सर में अंतिम पूजा एवं जागरण की पारंपरिक रस्म पूरी की।
भरमौर (उत्तम): सदियों से चली आ रही धार्मिक एवं पारंपरिक मान्यताओं का निर्वहन करते हुए शिव चेलों ने मणिमहेश से वापसी हड़सर में अंतिम पूजा एवं जागरण की पारंपरिक रस्म पूरी की। इसी के साथ धार्मिक मान्यताओं के आधार पर होने वाली श्री मणिमहेश यात्रा का विधिवत समापन हुआ। हड़सर में आयोजित इस पारंपरिक रस्म के दौरान मणिमहेश मंदिर एवं हड़सर के गौरीशंकर मंदिर के पुजारी पुन्नू राम शर्मा की मौजूदगी में धार्मिक रीति-रिवाजों का निर्वहन किया गया। शिव चेलों ने परंपरा के अनुसार अंतिम पूजा की रस्म को पूरा किया और इसके बाद यात्रा के समापन की प्रक्रिया संपन्न हुई।
मणिमहेश यात्रा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि भरमौर की सदियों पुरानी धार्मिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है। शिव चेलों द्वारा पीढ़ियों से इन परंपराओं का विधि-विधान और श्रद्धा के साथ निर्वहन किया जाता रहा है। इस वर्ष भी मणिमहेश यात्रा के दौरान डल झील में डल तोड़ने की पारंपरिक रस्म, शाही स्नान तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। इसके बाद शिव चेले वापस हड़सर पहुंचे, जहां गौरीशंकर मंदिर में अंतिम पूजा एवं जागरण की रस्म के साथ यात्रा के धार्मिक समापन की परंपरा पूरी की गई।
इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने भी पूरी श्रद्धा के साथ पारंपरिक रस्मों के दर्शन किए। अंतिम पूजा की रस्म पूरी होने के साथ ही वर्ष 2026 की श्री मणिमहेश यात्रा का एक और धार्मिक अध्याय विधिवत रूप से संपन्न हो गया। उल्लेखनीय है कि जब सचुई गांव के ये शिवजी के चेले डल झील को तोड़ने की रस्म अदा करने मणिमहेश जाते हैं तो हड़सर के गौरीशंकर मंदिर में जगराता करते हैं। वहां से इजाजत मिलने के बाद आगे की यात्रा शुरू करते हैं। ये पुरानी धार्मिक मान्यता है। जब डल झील तोड़ने के बाद वापस आते हैं, तब भी इस मंदिर में पूजा करते हैं, उसी के बाद इस यात्रा का साल भर के लिए विधिवत धार्मिक समापन माना जाता है और सभी छड़ियां अपने-अपने स्थानों के लिए प्रस्थान करती हैं।