Kangra: कृषि विश्वविद्यालय की भूमि पर फिर उठा विवाद, हपोटा ने राज्यपाल से की हस्तक्षेप की मांग

Edited By Kuldeep, Updated: 25 Jun, 2026 06:07 PM

palampur agricultural university

कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर की भूमि को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है।

पालमपुर (भृगु): कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर की भूमि को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है। विश्वविद्यालय की 112 हैक्टेयर भूमि को टूरिज्म विलेज के लिए हस्तांतरित करने का मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है, वहीं अब विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित धान एवं गेहूं अनुसंधान केंद्र मलां की बहुमूल्य भूमि को निजी हितों के लिए हस्तांतरित किए जाने के आरोप सामने आए हैं। कृषि विश्वविद्यालय प्राध्यापक संघ हपोटा ने इस मामले को गंभीर बताते हुए विश्वविद्यालय के कुलाधिपति एवं हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल के समक्ष अपना पक्ष रखा है।

संघ का आरोप है कि विश्वविद्यालय की लगभग 4 से 5 कनाल भूमि, जिसका उपयोग कृषि अनुसंधान, प्रदर्शन परियोजनाओं, विद्यार्थियों के प्रशिक्षण तथा किसानों के हित में संचालित कार्यक्रमों के लिए किया जाता है, उसे निजी उपयोग के लिए स्थानांतरित करने की हपोटा के अनुसार संबंधित भूमि विश्वविद्यालय की महत्वपूर्ण परिसंपत्तियों का हिस्सा है और इसका उपयोग कृषि अनुसंधान, शिक्षा, प्रदर्शन गतिविधियों तथा विस्तार कार्यक्रमों के लिए किया जाना प्रस्तावित है। संघ का कहना है कि एक राज्य कृषि विश्वविद्यालय होने के नाते भूमि संसाधनों की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है, ताकि शोध परियोजनाएं, फील्ड ट्रायल, विद्यार्थियों का प्रशिक्षण और किसानों के हित में चलने वाली गतिविधियां प्रभावित न हों।

संघ ने यह भी सवाल उठाया है कि जब संबंधित निजी भूमि तक पहले से ही राष्ट्रीय राजमार्ग से मैटल रोड के माध्यम से पहुंच उपलब्ध है, तो विश्वविद्यालय की करोड़ों रुपए मूल्य की भूमि के बीच से नया रास्ता निकालने की आवश्यकता क्यों महसूस की जा रही है।

हपोटा ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि कृषि मंत्री चंद्र कुमार ने 4 दिसम्बर, 2025 को मलां अनुसंधान केंद्र का दौरा किया था। उस दौरान उन्होंने अपनी टिप्पणी में कहा था कि विश्वविद्यालय की भूमि किसी को देने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि संबंधित क्षेत्र तक पहले से सड़क सुविधा उपलब्ध है।

इसके अलावा तत्कालीन कुलपति डा. अशोक कुमार पांडा द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति ने अप्रैल 2026 में स्थल निरीक्षण के बाद अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा था कि विश्वविद्यालय की भूमि का हस्तांतरण संस्थान के हित में नहीं होगा। समिति ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी थी कि इससे अनुसंधान गतिविधियों, कृषि परीक्षणों, फील्ड ट्रायल, छात्र प्रशिक्षण तथा भविष्य की विस्तार योजनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। समिति ने भूमि हस्तांतरण के प्रस्ताव को अस्वीकार करने की सिफारिश भी की थी।

हपोटा का आरोप है कि कृषि मंत्री की टिप्पणी और विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के बावजूद भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। संघ का कहना है कि इससे विश्वविद्यालय की संपत्ति की सुरक्षा, वैधानिक प्रावधानों के पालन तथा कृषि अनुसंधान और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए निर्धारित भूमि के संरक्षण को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।

संघ ने कहा कि विश्वविद्यालय की भूमि सार्वजनिक संपत्ति है, जो वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के विद्यार्थियों, वैज्ञानिकों तथा किसानों के हितों से जुड़ी हुई है। ऐसे में किसी भी प्रकार का हस्तांतरण विश्वविद्यालय के शिक्षण, अनुसंधान और विस्तार कार्यक्रमों पर दूरगामी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

प्राध्यापक संघ के सचिव डा. जनार्दन सिंह ने बताया कि संघ के समक्ष आए तथ्यों के आधार पर इस विषय पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। उन्होंने कहा कि संघ ने पूरे मामले को विश्वविद्यालय के कुलाधिपति एवं राज्यपाल के समक्ष रखने का निर्णय लिया है और पत्र के माध्यम से उन्हें स्थिति से अवगत करवाया गया है।

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