Edited By Vijay, Updated: 20 Feb, 2026 11:17 PM

देवभूमि की धरती पर हुनर की परंपरा आज भी जीवित है और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है। इसका सजीव उदाहरण अंतर्राष्ट्रीय महोत्सव के दौरान इंदिरा मार्कीट में सजे सरस मेले में देखने को मिल रहा है....
मंडी (फरेंद्र ठाकुर): देवभूमि की धरती पर हुनर की परंपरा आज भी जीवित है और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है। इसका सजीव उदाहरण अंतर्राष्ट्रीय महोत्सव के दौरान इंदिरा मार्कीट में सजे सरस मेले में देखने को मिल रहा है, जहां मंडी के अरड़ा निवासी कारीगर प्रकाश चंद का स्टाल लोगों की खास दिलचस्पी का केंद्र बना हुआ है। प्रकाश चंद चीड़ और शहतूत की बेकार लकड़ियों व जड़ों से मगरमच्छ, डायनासोर, मोर, बत्तख और बगुले जैसे जीवों की ऐसी जीवंत आकृतियां तैयार कर रहे हैं कि पहली नजर में लकड़ी नहीं बल्कि असली जीव प्रतीत होते हैं। दर्शक कलाकृतियों को हाथ में उठाकर देखने और तस्वीरें लेने से खुद को रोक नहीं पा रहे हैं।
करीब 12 वर्षों से इस कला से जुड़े प्रकाश चंद बताते हैं कि पहले जंगलों से लाई गई लकड़ियों को लगभग 3 माह तक पानी में सुरक्षित रखा जाता है, ताकि उनमें कीड़े न लगें। उसके बाद महीनों की मेहनत से आकार तराशा जाता है और अंत में पॉलिश कर उन्हें आकर्षक रूप दिया जाता है। इस कला को नई पहचान दिलाने में उनकी बहू की अहम भूमिका रही है। बहू ने न केवल इस हुनर को सीखा, बल्कि प्रदर्शनियों और मेलों तक पहुंचाकर इसे देशभर में पहचान दिलाई।
घरों, होटलों और होम-स्टे में की सजावट में हाेता कलाकृतियों का उपयोग
इन कलाकृतियों का उपयोग घरों, होटलों, होम-स्टे और कार्यालयों की सजावट में किया जाता है। लोग ड्राइंग रूम, गार्डन एरिया और शो-केस में इन्हें सजावटी वस्तु के रूप में रख रहे हैं, जिससे प्राकृतिक और पारंपरिक सौंदर्य झलकता है। पर्यटक इन्हें स्मृति चिन्ह के रूप में भी खरीद रहे हैं। कलाकृतियों की कीमत 200 से 20,000 रुपए तक है और पर्यटक इन्हें स्मृति चिन्ह के रूप में खरीद रहे हैं।
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