Edited By Kuldeep, Updated: 26 Oct, 2026 07:02 PM

अंतर्राष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव के दौरान जिला मुख्यालय स्थित ढालपुर मैदान में आस्था व अनूठी देव संस्कृतियों का संगम देखने को मिल रहा है।
कुल्लू (दिलीप): अंतर्राष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव के दौरान जिला मुख्यालय स्थित ढालपुर मैदान में आस्था व अनूठी देव संस्कृतियों का संगम देखने को मिल रहा है। उत्सव के चलते सैंकड़ों देवी-देवता अपने-अपने अस्थायी शिविरों में विराजमान हैं, जहां वे श्रद्धालुओं के कष्टों का निवारण कर रहे हैं। इस कड़ी में काइस धार व पीज घाटी के देव अजयपाल अपने देवलुओं व हारियानों के साथ ढोल-नगाड़ों की थाप पर वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच विशेष रूप से पुलिस थाना कुल्लू पहुंचे। यहां उन्होंने वर्षों से चली आ रही पुरानी परंपरा का निर्वहन किया। थाना परिसर में थोड़ी देर विश्राम करने और पुलिस कर्मियों को आशीर्वाद देने के बाद देवता अजयपाल वापस अपने शिविर के लिए लौट गए।
भक्त के लिए स्वयं थाने पहुंचे थे देवता अजयपाल
देवता अजयपाल के मुख्य पुजारी नूप राम ने इस अनूठी परंपरा के पीछे ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि देवता अजयपाल को भगवान विष्णु का साक्षात अवतार माना जाता है। कुल्लू थाना में हर वर्ष यह परंपरा करीब 100 वर्ष पुरानी है, जो अंग्रेजों के जमाने से जुड़ी हुई है। मान्यता के अनुसार, उस दौर में देवता अजयपाल का एक भक्त (कटियाला) खांपू हुआ करता था, जो देवता के भंडार के लिए गांवों से अनाज जमा करने का काम करता था।
एक बार खांपू ने किसी स्थानीय व्यक्ति की जमानत ली थी, लेकिन वह व्यक्ति समय पर पुलिस के सामने पेश नहीं हुआ। नियमानुसार ब्रिटिश पुलिस ने खांपू को गिरफ्तार कर लिया। जब पुलिस उसे बंदी बनाकर ला रही थी, तो रास्ते में खांपू के हाथ में बंधी एक हथकड़ी अचानक खुद-ब-खुद टूट गई। इसके बाद जब पुलिस उसे लेकर कुल्लू थाने पहुंची तो वहां उसकी दूसरी बेड़ी भी अपने आप टूट गई।
इस अद्भुत घटना से हैरान होकर साथ चल रहे अंग्रेज पुलिसकर्मी ने खांपू से पूछा कि तुम्हारे पीछे कौन चल रहा है? खांपू ने मुड़कर देखा तो उसे कोई नजर नहीं आया और कहा कि पीछे कोई नहीं है लेकिन पुलिस वालों को खांपू के ठीक पीछे एक दिव्य पुरुष लगातार चलता हुआ दिखाई दे रहा था। वह दिव्य पुरुष कोई और नहीं, बल्कि अपने भक्त की रक्षा के लिए स्वयं आए देवता अजयपाल थे।
बेड़ियां टूटने को माना चमत्कार, तब से निभाई जा रही है परंपरा
पुजारी नूप राम ने बताया कि जब थाने में दूसरी बेड़ी भी बिना किसी चाबी के टूट गई, तो पुलिस कर्मियों ने इसे दैवीय चमत्कार माना और खांपू को तुरंत ससम्मान रिहा कर दिया। जब खांपू थाने से वापस लौट रहा था तो रास्ते में उसे वही व्यक्ति मिल गया जिसकी वजह से उसे गिरफ्तार होना पड़ा था। खांपू ने उस व्यक्ति को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया।
इस घटना के बाद पुलिस कर्मचारियों और स्थानीय लोगों में देवता के प्रति अटूट श्रद्धा पैदा हो गई। चूंकि उस समय अपने भक्त को छुड़ाने के लिए देवता अजयपाल पहली बार कुल्लू थाना परिसर आए थे और वहां कुछ देर रुके थे, उसी स्मृति व परंपरा का पालन करते हुए देवता आज भी हर साल दशहरा उत्सव के दौरान कुल्लू थाना परिसर में थोड़ी देर विश्राम के लिए आते हैं।
बीड़ भंगाल से पीज पहुंचे देवता और सूखा खत्म
पुजारी नूप राम ने बताया कि देवता अजयपाल मूल रूप से कांगड़ा जिले के बीड़ भंगाल क्षेत्र से अपनी पत्नी के साथ कुल्लू आए थे। कुल्लू आगमन पर उन्होंने एक दिन काईस धार में गुजारा, लेकिन उन्हें वह स्थान उचित नहीं लगा। इसके बाद देवता अपनी पत्नी सहित पीज क्षेत्र के बागन गांव पहुंचे और वहीं स्थापित हो गए। कहा जाता है कि उस दौरान कुल्लू और पीज इलाके में भयंकर सूखा व अकाल पड़ा था लेकिन जैसे ही देवता अजयपाल ने बागन गांव में कदम रखा तो पूरे इलाके में मूसलाधार बारिश हुई और सूखी धरती हरी-भरी हो गई।
उस साल फसल भी बेहद शानदार हुई। इस अकाल से निजात मिलने के बाद ग्रामीणों ने वहां देवता का मंदिर बनाया। आज भी मान्यता है कि देवता अजयपाल क्षेत्र को सूखे व अकाल जैसी प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखते हैं।