Edited By Kuldeep, Updated: 23 Sep, 2026 10:41 PM

घेपन ग्लेशियल झील के बढ़ रहे जलस्तर से संभावित आपदा जोखिम को देखते हुए लाहौल-स्पीति प्रशासन ने निगरानी और एहतियाती तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
केलांग (ब्यूरो): घेपन ग्लेशियल झील के बढ़ रहे जलस्तर से संभावित आपदा जोखिम को देखते हुए लाहौल-स्पीति प्रशासन ने निगरानी और एहतियाती तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इस क्रम में डीसी एवं अध्यक्ष जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण किरण भड़ाना ने मंगलवार को सिस्सू से लगभग 14 किलोमीटर ऊपर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में स्थित घेपन झील का दौरा कर स्थिति का जायजा लिया। डी.सी. ने झील के जलस्तर, आसपास के भू-भाग तथा पानी के संभावित बहाव मार्ग का अवलोकन किया तथा अधिकारियों के साथ जलस्तर को नियंत्रित अथवा कम करने के लिए सुरक्षित उपायों पर विचार-विमर्श किया।
उन्होंने अधिकारियों एवं कर्मचारियों से भौगोलिक परिस्थितियों के संबंध में जानकारी प्राप्त की। उन्होंने अधिकारियों को झील से संबंधित प्रत्येक महत्वपूर्ण तथ्य एवं संभावित जोखिम का वैज्ञानिक एवं तकनीकी दृष्टि से आकलन करने के निर्देश दिए। निरीक्षण दल में विभिन्न विभागों के 15 अधिकारी एवं कर्मचारी शामिल रहे। इस मौके पर परियोजना अधिकारी आईटीडीपी अश्विनी कुमार शर्मा, उप वन क्षेत्रपाल लीलामणि, चिकित्सा अधिकारी डा. सुषमा, डा. विक्रांत नेगी, प्रभारी अधिकारी, बीआरओ 94 आरसीसी कैप्टन हरिओम शरण, अग्निशमन केंद्र केलांग के प्रभारी रतन चंद, होमगार्ड व फायरमैन छेरिंग आंगरुप सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी व कर्मचारी मौजूद रहे।
डीसी किरण भड़ाना मंगलवार को ही निरीक्षण के उपरांत वापस लौट आईं, जबकि टीम के अन्य सदस्य बुधवार दोपहर बाद तक केलांग लौटे। गौरतलब है कि लगभग 4070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित घेपन झील से जुड़े संभावित जोखिमों को देखते हुए भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण की विशेषज्ञ टीम भी झील एवं आसपास के क्षेत्र का अध्ययन कर चुकी है।
डीसी किरण भड़ाना ने कहा कि घेपन झील के आसपास ग्लेशियर व पर्वत मौजूद हैं, जिनकी स्थिरता की नियमित निगरानी अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि नेपाल में हुई त्रासदी ने भी ग्लेशियरों की अस्थिरता से उत्पन्न संभावित खतरों की गंभीरता को रेखांकित किया है। ऐसे में घेपन झील के आसपास ग्लेशियरों तथा पर्वतीय क्षेत्रों की स्थिरता का समय-समय पर वैज्ञानिक आकलन एवं निगरानी सुनिश्चित की जा रही है।
उन्होंने बताया कि विभिन्न स्तरों पर आकलनों के अनुसार यदि किसी आपदा की स्थिति में झील का पानी अचानक नीचे आता है तो उपलब्ध प्रारंभिक आकलन में लगभग 22 मिनट में भारी मात्रा में पानी आबादी वाले क्षेत्र तक पहुंच सकता है। हालांकि भौगोलिक एवं व्यावहारिक परिस्थितियों को देखते हुए पानी इससे कहीं कम समय में लगभग 5 मिनट में आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।
इस संभावित जोखिम को देखते हुए आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को संवेदनशील क्षेत्रों के लोगों के लिए प्रभावी निकासी योजना तैयार करने, नियमित जागरूकता एवं मॉक ड्रिल आयोजित करने व त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था को मजबूत करने पर विशेष ध्यान देना होगा। समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की व्यवस्था से संभावित आपदा के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
डीसी ने बताया कि जिला प्रशासन द्वारा घेपन झील में अर्ली वाॅर्निंग सिस्टम स्थापित करने का भी कार्य किया जा रहा है। इसके तहत झील के जलस्तर सहित महत्वपूर्ण मानकों की लगातार निगरानी कर वास्तविक समय में जानकारी उपलब्ध हो सकेगी तथा किसी संभावित खतरे की स्थिति में समय रहते लोगों को सुरक्षित किया जा सकेगा। इसे लेकर तिरुवनंतपुरम की सी-डैक द्वारा सिस्सू झील में परीक्षण किया जा चुका है।