Himachal: 4 लोग और चारों लाचार...दवा के लिए भी मोहताज हुआ परिवार, सीएम से लगाई मदद की गुहार

Edited By Vijay, Updated: 14 Jan, 2026 03:19 PM

helpless family

जिला बिलासपुर की ग्राम पंचायत जुखाला के गांव आशा मजारी में एक ऐसा परिवार है, जिसके लिए हर नया सवेरा एक नई चुनौती लेकर आता है। जहां पूरा परिवार ही असहाय हो, वहां दर्द सिर्फ शरीर का नहीं, बल्कि आत्मा का भी होता है।

बिलासपुर (बंशीधर): जिला बिलासपुर की ग्राम पंचायत जुखाला के गांव आशा मजारी में एक ऐसा परिवार है, जिसके लिए हर नया सवेरा एक नई चुनौती लेकर आता है। जहां पूरा परिवार ही असहाय हो, वहां दर्द सिर्फ शरीर का नहीं, बल्कि आत्मा का भी होता है। वर्षों से दिव्यांगता, बीमारी और घोर आर्थिक तंगी से जूझ रहे निक्कू राम और उनके परिवार ने अब अपनी आखिरी उम्मीद मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से बांधी है और ज्ञापन भेजकर मानवीय सहायता की गुहार लगाई है।

32 साल पहले एक हादसे ने बदल दी जिंदगी
निक्कू राम कभी एक कुशल मिस्त्री (बढ़ई) हुआ करते थे और अपनी मेहनत से परिवार पाल रहे थे। लेकिन करीब 32 वर्ष पूर्व मकान निर्माण के दौरान हुए एक हादसे ने उनकी दुनिया ही उजाड़ दी। ऊंचाई से गिरने के कारण उनकी रीढ़ की हड्डी टूट गई। वे 7-8 वर्षों तक बिस्तर पर रहे। आज वे 70 प्रतिशत दिव्यांग हैं और चलने-फिरने में असमर्थ हैं।

खुद दिव्यांग पति करता है पैरालाइज्ड पत्नी की सेवा
निक्कू राम का संघर्ष यहीं खत्म नहीं होता। उनकी पत्नी सवित्री देवी मानसिक रोग से पीड़ित हैं और 77 प्रतिशत दिव्यांग हैं। वे पूर्ण रूप से पैरालाइज्ड (लकवाग्रस्त) हैं और बिस्तर से उठ भी नहीं सकतीं। विडंबना यह है कि खुद चलने में असमर्थ निक्कू राम को अपने पैरों का सहारा लेकर पत्नी की दिन में दो बार मालिश करनी पड़ती है, अन्यथा उनका शरीर अकड़ जाता है।

बेटों पर भी कुदरत की मार
कुदरत का कहर इस परिवार पर यहीं नहीं थमता। बड़ा बेटा विजय कुमार मानसिक रूप से विक्षिप्त है और 85 प्रतिशत दिव्यांगता से ग्रस्त है। उसे भी निक्कू राम की तरह ही देखभाल की जरूरत है। छोटा बेटा राजकुमार दृष्टिबाधित है और उसकी कमर में प्लेट लगी होने के कारण वह कोई भारी काम कर आजीविका कमाने में असमर्थ है।

पैशन बंद, दवा का खर्च 19 हजार
परिवार के पास आजीविका का कोई स्थायी साधन नहीं है। 5-6 बीघा जमीन है, लेकिन चारों तरफ चीड़ का जंगल होने के कारण वहां खेती संभव नहीं है। परिवार का गुजारा 'सहारा योजना' की पेंशन पर था, लेकिन पिछले 6-7 महीनों से वह भी बंद पड़ी है। निक्कू राम ने बताया कि घर में हर महीने केवल दवाइयों का खर्च ही 18 से 19 हजार रुपए है। कई बार मोबाइल रिचार्ज तक के पैसे नहीं होते।

मदद नहीं मिली तो परिवार का जीवित रहना मुश्किल
निक्कू राम ने मुख्यमंत्री को भेजे भावुक ज्ञापन में लिखा है कि यदि समय रहते मदद नहीं मिली, तो परिवार का जीवित रहना मुश्किल हो जाएगा। उन्हें पितृ दोष निवारण के लिए गया जी (बिहार) जाने की सलाह मिली है, लेकिन 50 हजार का खर्च उनकी हैसियत से बाहर है। पीड़ित ने सरकार से अपील की है कि नियमों से परे जाकर मानवीय आधार पर उनके परिवार की सुध ली जाए।

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