Edited By Kuldeep, Updated: 22 Sep, 2026 09:18 PM

प्रदेश हाईकोर्ट ने ऑप्रेशन थिएटर असिस्टैंट भर्ती मामले में साफ किया है कि योग्यता तय करना नियोक्ता का विशेषाधिकार है और अदालत इसमें कोई बदलाव नहीं कर सकती।
शिमला (मनोहर): प्रदेश हाईकोर्ट ने ऑप्रेशन थिएटर असिस्टैंट भर्ती मामले में साफ किया है कि योग्यता तय करना नियोक्ता का विशेषाधिकार है और अदालत इसमें कोई बदलाव नहीं कर सकती। कोर्ट ने साफ किया कि अगर भर्ती नियमों और विज्ञापन की भाषा स्पष्ट है तो न्यायिक समीक्षा के नाम पर शर्तों को शिथिल नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश रंजन शर्मा ने नरिंदर कुमार और अन्य द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। मामले के अनुसार कर्मचारी चयन आयोग ने 16 सितम्बर 2017 को जारी विज्ञापन के तहत ऑप्रेशन थिएटर असिस्टैंट (पोस्ट कोड-642) के 113 पदों के लिए आवेदन मांगे थे। भर्ती नियमों के अनुसार उम्मीदवार का 50 प्रतिशत अंकों के साथ 10 जमा 2 साइंस (भौतिकी, रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान) उत्तीर्ण होना और साथ ही मान्यता प्राप्त संस्थान से ओटीए ट्रेनिंग कोर्स या समकक्ष डिग्री होना अनिवार्य था।
याचिकाकर्त्ताओं ने आवेदन किया और उन्हें मूल्यांकन के लिए भी बुलाया गया, लेकिन बाद में आयोग ने उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया क्योंकि उनके पास 10 जमा 2 में आवश्यक साइंस विषय (विशेषकर जीव विज्ञान) नहीं थे। कोर्ट में याचिकाकर्त्ताओं ने इस शर्त को मनमाना और अवैध बताते हुए चुनौती दी थी। नमिता देवी ने 10 जमा 2 कॉमर्स से की थी, जबकि करण शेखर ने साइंस से की थी लेकिन उनके पास बायोलॉजी (जीव विज्ञान) विषय नहीं था। उनका तर्क था कि जब सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थान से उन्हें ओटीए डिप्लोमा करने की अनुमति मिल गई तो भर्ती में 10 जमा 2 के विषयों के आधार पर उन्हें बाहर नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्त्ताओं की इन दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि ऑप्रेशन थिएटर असिस्टैंट के रूप में काम करने वाले कर्मियों के लिए मानव शरीर और जैविक स्थितियों का बुनियादी ज्ञान होना जरूरी है। नियमों के विपरीत जाकर किसी अयोग्य उम्मीदवार को भर्ती प्रक्रिया में शामिल करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 (समानता के अधिकार) के साथ धोखा होगा। अदालत ने विज्ञापन की शर्तों को सही ठहराया और कहा कि इसमें किसी भी प्रकार की अवैधता या मनमानापन नहीं है। नतीजतन उम्मीदवारों का आवेदन रद्द करने के आयोग के फैसले को बरकरार रखते हुए रिट याचिका को खारिज कर दिया गया। हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्त्ताओं को नियमों में छूट के लिए संबंधित प्राधिकारी के समक्ष जाने की कानूनी स्वतंत्रता खुली रखी है।