Edited By Kuldeep, Updated: 12 Aug, 2026 09:02 PM

प्रदेश हाईकोर्ट ने जमीन और काश्तकारी विवाद से जुड़े पुराने मामले में स्पष्ट किया है कि किसी भी संपत्ति की केवल लंबे समय तक देखरेख करने वाला केयरटेकर या नौकर, उस संपत्ति पर कभी भी मालिकाना हक या काश्तकारी अधिकार का दावा नहीं कर सकता।
शिमला (मनोहर): प्रदेश हाईकोर्ट ने जमीन और काश्तकारी विवाद से जुड़े पुराने मामले में स्पष्ट किया है कि किसी भी संपत्ति की केवल लंबे समय तक देखरेख करने वाला केयरटेकर या नौकर, उस संपत्ति पर कभी भी मालिकाना हक या काश्तकारी अधिकार का दावा नहीं कर सकता। न्यायाधीश रोमेश वर्मा ने करीब 49 वर्षों से चल रहे इस कानूनी विवाद को समाप्त करते हुए प्रतिवादी (केयरटेकर) की अपील को खारिज कर दिया।
यह कानूनी लड़ाई साल 1977 में कांगड़ा जिला के धर्मशाला की अदालत से शुरू हुई थी। वादी ने प्रतिवादी के खिलाफ जमीन की बहाली और कब्जे के लिए मुकद्दमा दायर किया था। वादी का कहना था कि उनके पिता ने अपनी अनुपस्थिति में प्रतिवादी को केवल जमीन और मकान की देखरेख के लिए रखा था, लेकिन प्रतिवादी ने राजस्व कर्मियों से मिलीभगत कर राजस्व रिकॉर्ड (खसरा गिरदावरी) में खुद को धोखे से किराएदार दर्ज करवा लिया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पाया कि साल 1976 में पटवारी द्वारा खसरा गिरदावरी में प्रतिवादी का नाम बतौर किराएदार दर्ज करते समय 'हिमाचल प्रदेश लैंड रिकॉर्ड्स मैन्युअल' के नियम 9.8 और 8.15 का कड़ा उल्लंघन किया गया था। अदालत ने दुख जताते हुए कहा कि वादी साल 1977 से न्याय के लिए दर-दर भटक रहा है और करीब 49 साल बीत जाने के बाद भी उसे अपनी ही संपत्ति का सुख नहीं मिल सका। हाईकोर्ट ने निचली दोनों अदालतों (ट्रायल कोर्ट और जिला अदालत धर्मशाला) के पुराने फैसलों को सही ठहराते हुए आदेश दिया कि वादी को उसकी जमीन का वास्तविक कब्जा तुरंत दिलाया जाए।