Edited By Kuldeep, Updated: 23 Sep, 2026 09:27 PM

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकार अनजाने में या टाइपिंग मिस्टेक से दिए गए गलत पे-स्केल (वेतनमान) को सुधारने और घटाने का अधिकार रखती है।
शिमला (मनोहर): हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकार अनजाने में या टाइपिंग मिस्टेक से दिए गए गलत पे-स्केल (वेतनमान) को सुधारने और घटाने का अधिकार रखती है। नियमों के खिलाफ जाकर दिए गए किसी भी गलत पे-स्केल को जारी रखने के लिए कर्मचारियों को कोई कानूनी संरक्षण नहीं दिया जा सकता। यह महत्वपूर्ण व्यवस्था न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज ने ज्योति शर्मा और अन्य द्वारा दायर याचिका का निपटारा करते हुए दी।
कोर्ट ने कहा कि किसी भी सरकारी कर्मचारी की सेवा शर्तें और वेतनमान केवल और केवल राज्य सरकार द्वारा बनाए गए सांविधिक नियमों से ही तय होते हैं। यदि किसी विज्ञापन या नियुक्ति पत्र में क्लर्क या विभाग की लापरवाही से नियमों के विपरीत जाकर उच्च वेतनमान दर्ज हो गया है तो सरकार को उस भूल को सुधारने और पे-स्केल को घटाने से रोका नहीं जा सकता। याचिकाकर्त्ताओं ने दलील दी थी कि सरकार अपने वायदे से पीछे नहीं हट सकती। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह सिद्धांत तब तक लागू नहीं होता, जब तक कि वह बढ़ा हुआ वेतनमान भर्ती नियमों के अनुकूल न हो। नियमों के खिलाफ दी गई सैलरी को हमेशा जारी रखने से प्रशासनिक अराजकता फैल जाएगी।
महाधिवक्ता कार्यालय में अनुबंध के आधार पर जूनियर स्केल स्टैनोग्राफरों की भर्ती की गई थी। भर्ती नियमों के अनुसार उनका तय मानदेय 8,710 रुपए प्रति माह होना चाहिए था, लेकिन गलती से विज्ञापन और ज्वाइनिंग लैटर में 13,500 रुपए प्रति माह का उच्च पे-स्केल दर्ज हो गया। एक साल के बाद गलती पकड़ में आने पर विभाग ने एक अधिसूचना जारी कर कर्मचारियों का पे-स्केल घटा दिया और उनसे पिछले अतिरिक्त भुगतान की वसूली के लिए नोटिस जारी कर दिया, जिसे कर्मचारियों ने चुनौती दी थी। कोर्ट ने सरकार द्वारा पे-स्केल को 13,500 रुपए से घटाकर नियमों के मुताबिक 8,710 रुपए करने के फैसले को सही माना। साथ ही कोर्ट ने कर्मचारियों को राहत देते हुए कहा कि चूंकि इस गलती में कर्मचारियों का कोई फ्रॉड या मिलीभगत नहीं थी, इसलिए उनसे पिछले भुगतान की कोई वसूली नहीं की जा सकती।