Edited By Swati Sharma, Updated: 30 Aug, 2026 12:11 PM

हाल ही में नेपाल में ग्लेशियर झील फटने से आई भयानक बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है, जिसमें सैंकड़ों जानें चली गई और बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा जमींदोज हो गया। इस महाविनाश ने पड़ोसी हिमालयी राज्य हिमाचल प्रदेश में भी खतरे की घंटी बजा दी है। प्राकृतिक...
Nepal floods : हाल ही में नेपाल में ग्लेशियर झील फटने से आई भयानक बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है, जिसमें सैंकड़ों जानें चली गई और बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा जमींदोज हो गया। इस महाविनाश ने पड़ोसी हिमालयी राज्य हिमाचल प्रदेश में भी खतरे की घंटी बजा दी है। प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से बेहद संवेदनशील हिमाचल के लोग सहमे हुए हैं। अगर इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें, तो हिमाचल प्रदेश में भी अतीत में बिल्कुल नेपाल जैसे हालात पैदा हो चुके हैं, जब ग्लेशियर की झीलों ने टूटकर नदियों में सुनामी जैसा जलप्रलय ला दिया था। नेपाल की तरह ही हिमाचल में भी ग्लेशियर झीलों के फटने से भयानक तबाही का पुराना इतिहास रहा है। मुख्य रूप से दो ऐसी बड़ी घटनाएं हुई हैं, जिनकी दहशत आज भी लोगों के जहन में जिंदा है।
वर्ष 2000 की विनाशकारी बाढ़, सतलुज में अचानक जलप्रलय
31 जुलाई और 1 अगस्त, 2000 की दरम्यानी रात को सतलुज वेसिन में तिब्बत की तरफ एक ग्लेशियर झील फटने और भारी बारिश से अचानक फ्लैश फ्लड आ गया। इस सैलाव की वजह से सतलुज नदी का जलस्तर सामान्य से लगभग 60 फुट ऊपर पहुंच गया था। इस महाप्रलय में नेशनल हाईवे-22 हिंदुस्तान-तिब्बत मार्ग का करीब 200 किलोमीटर हिस्सा पूरी तरह से बह गया था। 20 बड़े पुल और 22 झूले पानी के बहाव में तिनके की तरह बह गए। इस दर्दनाक हादसे में 185 लोगों की मौत हुई थी और राज्य को लगभग 1,466 करोड़ का भारी आर्थिक नुक्सान झेलना पड़ा था।
वर्ष 2005 में पारछू झील का फटना, लाया था तबाही
वहीं, 26 जून, 2005 में चीन-अधिकृत तिब्बत क्षेत्र में स्थित पारडू ग्लेशियर झील का प्राकृतिक बांध अचानक टूट गया। चूंकि यह झील सतलुज नदी से जुड़ी हुई थी, इसलिए इसका सारा मलवा और लाखों क्यूसेक पानी तीव्र गति से हिमाचल के किन्नौर और शिमला जिलों में आ घुसा। पारछू के फटने से वांगतू से समदो के बीच एन.एच.-22 का 10 किलोमीटर हिस्सा पूरी तरह नक्शे से ही गायब हो गया। पानी का वेग इतना भयंकर था कि 10 कंक्रीट के पुल और 11 रोपवे पलक झपकते ही तबाह हो गए। हालांकि, 2000 की त्रासदी से सबक लेते हुए प्रशासन ने पहले ही अलर्ट जारी कर दिया था, जिससे जनहानि कम हुई।
वर्तमान में हिमाचल पर क्यों मंडरा रहा है खतरा?
नेपाल की वर्तमान त्रासदी के बाद मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने राज्य विधानसभा में शोक व्यक्त करते हुए इसे हिमालयी क्षेत्र में गहराते जलवायु संकट, का स्पष्ट संकेत बताया है। वर्तमान हालात इसलिए चिंताजनक हैं। झीलों का खतरनाक जाल इसको न्यौता दे रहा है। हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिपद ( हिमकोस्ट) के ताजा उपग्रह अध्ययन के अनुसार, अकेले सतलुज वेसिन में 2,292 ग्लेशियल झीलें चिन्हित की गई हैं। तापमान वढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। लाहौल-स्पीति की गीपनगाथ झील का दायरा 1975 में 27 हेक्टेयर था, जो अब बढ़कर 110 हैक्टेयर से अधिक हो गया है। सतलुज नदी से जुड़ी आधी से ज्यादा 1,335 ग्लेशियर झीलें चीन-अधिकृत तिव्यत में हैं, जहां भारत का कोई जमीनी नियंत्रण या निगरानी तंत्र नहीं है। यदि वहां कोई झील टूटती है, तो मलवा सीधा हिमाचल के किन्नौर और रामपुर होते हुए पंजाब के मैदानी इलाकों तक तबाही मचा सकता है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने वासुकी झील, गीपनगाथ झील, वास्पा झील और कलका झील को बेहद खतरनाक श्रेणी में रखा है।
बरती जा रही है एहतियात
नेपाल में आई वाढ़ के तुरंत बाद हिमाचल प्रदेश को हाई अलर्ट पर रखा गया है। खतरे को भांपते हुए हिमकोस्ट, इसरो और एनडीएमए के साथ मिलकर सरकार 24 घंटे सेटेलाइट के माध्यम से उच्च हिमालयी झीलों की मॉनीटरिंग कर रही है। इसके अलावा संवेदनशील ग्लेशियल आस-पास अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किए जा रहे हैं, ताकि पारछू या 2000 जैसी किसी भी संभावित जलप्रलय से पहले लोगों को सुरक्षित निकाला जा सके। बता दें कि ग्लेशियर फटने के अलावा जुलाई और अगस्त 2023 में अत्यधिक बारिश और बादलों के फटने के कारण भी हिमाचल ने नेपाल जैसी विनाशकारी त्रासदी देखी थी, जिसमें कुल्लू, मंडी और शिमला में 500 से ज्यादा लोगों की जान गई थी और हजारों घर मलबे में तबदील हो गए थे।
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