Himachal: कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने विकसित की मक्की की नई किस्म, किसानों को मिलेगा अधिक पैदावार का लाभ

Edited By Vijay, Updated: 04 May, 2025 12:38 PM

agricultural university scientists developed new variety of corn

प्रदेश के मक्की उत्पादक क्षेत्र में अधिक उपज देने वाली नई मक्की की किस्म को कृषि वैज्ञानिकों ने विकसित किया है। कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने हिम पालम मक्की कंपोजिट 2 (एल 316) किस्म विकसित की है....

पालमपुर (भृगु): प्रदेश के मक्की उत्पादक क्षेत्र में अधिक उपज देने वाली नई मक्की की किस्म को कृषि वैज्ञानिकों ने विकसित किया है। कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने हिम पालम मक्की कंपोजिट 2 (एल 316) किस्म विकसित की है तथा इस किस्म को खरीफ फसलों पर कृषि अधिकारी कार्यशाला में रिलीज किया गया। इस किस्म का उपयोग खाने तथा चारे के लिए किया जा सकेगा। मक्की की इस किस्म के पत्ते मैच्योरिटी तक हर रहते हैं जिस कारण इसका उपयोग चारे के लिए किया जा सकता है। यह समय पर पकने वाली किस्म है तथा 98 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। 

संकुल मक्की किस्मों में सर्वाधिक पैदावार
संकुल मक्की की  किस्म  हिम पालम मक्की कंपोजिट 2 (एल 316) की विशेषता है कि यह किस्म समय पर तैयार होने वाली किस्म है। हिम पालम मक्की कंपोजिट 2 (एल 316)  हिमाचल प्रदेश के निचले व मध्यवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। ये वही क्षेत्र हैं जहां प्रदेश में उगाई जाने वाली मक्की की 80 प्रतिशत से अधिक पैदावार होती है। यह किस्म हिमाचल प्रदेश के निचले व मध्यवर्ती पर्वतीय क्षेत्र के लिए उपयुक्त है। ऐसे में राज्य के चम्बा, किन्नौर तथा लाहौल एवं स्पीति जनपदों को छोड़कर प्रदेश के अन्य मक्की उत्पादक क्षेत्र के लिए यह किस्म उपयोगी मानी जा रही है। मक्की की इस किस्म की विशेषता यह है कि इसके दाने मोटे, नारंगी व दातेंदार होते हैं। यह किस्म 98 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 65.66 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है जो कंपोजिट मक्की किस्म में सबसे अधिक है। यद्यपि हाईब्रिड किस्मों की पैदावार अधिक प्राप्त होती है। 
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4 वर्ष तक किया जा सकेगा बीज का उपयोग 
हिम पालम मक्की कंपोजिट 2(एल 316) की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि हाईब्रिड किस्म के भांति इसके बीज को प्रतिवर्ष नहीं खरीदना होगा। इसके बीज को चार वर्ष तक उपयोग में लाया जा सकेगा तथा किसान इसे अपने खेतों में ही तैयार कर सकेंगे। ऐसे में बाजार से महंगा बीज खरीदने से भी किसान बच सकेंगे जिसका सीधा सकारात्मक लाभ उनकी आर्थिकी पर पड़ेगा। वही मक्की की यह नई किस्म टर्सिकम झुलसा रोग, जीवाणु तना सड़न एवं तना बेधक की प्रतिरोधी है। 

क्या कहते हैं वैज्ञानिक और कुलपति
अनुवांशिकी एवं पौध प्रजनन विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. उत्तम चंदेल ने बताया कि मक्की की यह नई किस्म किसानों के लिए अत्यधिक उपयोगी है। पौधों की ऊंचाई मध्यम आकार की होने के कारण तेज हवा के कारण इसके गिरने की संभावना भी कम है। वहीं कृषि विश्वविद्यालय कुलपति डॉ. नवीन कुमार ने कहा कि प्रदेश के निचले व मध्यवर्ती पर्वतीय क्षेत्र के लिए मक्की की यह किस्म उपयोगी है तथा अनेक रोगों के प्रति प्रतिरोधी है। यह किस्म मक्की उत्पादक क्षेत्रों के लिए अत्यधिक उपयोगी है।
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