Edited By Vijay, Updated: 14 Jan, 2026 11:29 AM

बाहर हाड़ कंपा देने वाली ठंड और पानी में कुदरती गर्माहट... कुदरत और आस्था का ऐसा ही अद्भुत संगम आज हिमाचल प्रदेश के तत्तापानी में देखने को मिल रहा है। मकर संक्रांति के पावन अवसर पर यहां आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है।
शिमला/तत्तापानी: बाहर हाड़ कंपा देने वाली ठंड और पानी में कुदरती गर्माहट... कुदरत और आस्था का ऐसा ही अद्भुत संगम आज हिमाचल प्रदेश के तत्तापानी में देखने को मिल रहा है। मकर संक्रांति के पावन अवसर पर यहां आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है। शिमला से 56 किलोमीटर दूर सतलुज नदी के किनारे स्थित इस पवित्र स्थल पर सुबह 4 बजे से ही श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है, जो कड़ाके की सर्दी में यहां के प्राकृतिक गर्म पानी के चश्मों में आस्था की डुबकी लगा रहे हैं।
सुबह 4 बजे से चल रहा शाही स्नान और तुलादान
'तत्तापानी' का स्थानीय भाषा में अर्थ होता है 'तपा हुआ' या 'गर्म पानी'। मान्यता है कि यहां स्नान करने से न केवल पुण्य मिलता है, बल्कि त्वचा संबंधी रोग भी दूर होते हैं। इसी विश्वास के साथ हजारों लोग ब्रह्म मुहूर्त से ही यहां स्नान कर रहे हैं। स्नान के बाद बड़ी संख्या में श्रद्धालु ग्रहों की शांति के लिए 'तुलादान' भी करवा रहे हैं। इस मौके पर राज्य के राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी भी विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे।
97 साल पुरानी परंपरा आज भी कायम
तत्तापानी में स्नान के साथ-साथ 'खिचड़ी' के प्रसाद का विशेष महत्व है। यहां सूद परिवार द्वारा निभाई जा रही 97 साल पुरानी परंपरा के तहत आज श्रद्धालुओं को 3 क्विंटल खिचड़ी परोसी जा रही है। शिमला निवासी मोहित सूद ने बताया कि उनके पूर्वज बिहारी लाल जी ने यह परंपरा शुरू की थी, जिसे आज भी उनका परिवार निभा रहा है। गौरतलब है कि तत्तापानी खिचड़ी वितरण के लिए गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा चुका है। वर्ष 2020 में यहां मकर संक्रांति पर हरियाणा के यमुनानगर से लाए गए विशाल पतीले में 4.5 क्विंटल खिचड़ी बनाकर विश्व रिकॉर्ड बनाया गया था।
त्रेता युग से जुड़ा है इतिहास
तत्तापानी का धार्मिक इतिहास त्रेता युग से जुड़ा है। इसे ऋषि जमदग्नि और भगवान परशुराम की तपोस्थली माना जाता है। किवदंतियों के अनुसार महर्षि जमदग्नि ने अपनी पत्नी रेणुका और पुत्र परशुराम के साथ यहां गुफा में वास किया था।
1952 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया था स्नान सरोवर का उद्घाटन
आधुनिक इतिहास की बात करें तो भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी 22 सितम्बर, 1952 को तत्तापानी आए थे। उन्होंने यहां एक स्नान सरोवर का उद्घाटन किया था। हालांकि, कोल डैम बनने के बाद वह सरोवर जलमग्न हो गया, लेकिन उसकी उद्घाटन पट्टिका को समाजसेवी प्रेम रैना ने आज भी अपने होटल में धरोहर की तरह संभाल कर रखा है।
विज्ञान और कुदरत का करिश्मा
धार्मिक आस्था से परे, तत्तापानी भू-वैज्ञानिक दृष्टि से भी खास है। यहां के पानी में गंधक की मात्रा अधिक है, जो चर्म रोगों को ठीक करने में सहायक है। सतलुज नदी पर वर्ष 2013 में कोल डैम बनने के बाद पुराना स्रोत डूब गया था, जिसके बाद जियोलॉजिकल विभाग ने ड्रिलिंग कर नदी किनारे दोबारा गर्म पानी निकाला और श्रद्धालुओं के लिए पक्के कुंड तैयार किए। यहां सर्दियों में भी पानी और आसपास का तापमान गर्म रहता है।