Himachal: कैग रिपोर्ट... अगले 10 वर्ष में सरकार को लौटाना होगा 21,419.89 करोड़ कर्ज

Edited By Kuldeep, Updated: 31 Aug, 2025 10:27 PM

shimla himachal government debt

भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक (कैग) की वर्ष 2023-24 की रिपोर्ट ने हिमाचल प्रदेश के वित्तीय हालात को लेकर गंभीर चिंता जताई है। प्रदेश पर लगातार बढ़ते कर्ज के कारण अगले 10 वर्ष में राज्य को 21,419.89 करोड़ रुपए का कर्ज लौटाना होगा।

शिमला (कुलदीप): भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक (कैग) की वर्ष 2023-24 की रिपोर्ट ने हिमाचल प्रदेश के वित्तीय हालात को लेकर गंभीर चिंता जताई है। प्रदेश पर लगातार बढ़ते कर्ज के कारण अगले 10 वर्ष में राज्य को 21,419.89 करोड़ रुपए का कर्ज लौटाना होगा। इस तरह वर्ष 2028-29 में लोक ऋण अदायगी व ब्याज पर ही 8,423.75 करोड़ व्यय करना होगा। रिपोर्ट के अनुसार वित्तीय मार्च 2024 तक हिमाचल प्रदेश पर ब्याज सहित 97,829.96 करोड़ रुपए कर्ज ब्याज सहित चढ़ चुका था। इसमें मूलधन 62,372.17 करोड़ रुपए और इसके ऊपर चढ़ा ब्याज 35,457.79 करोड़ रुपए है।

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष, 2023-24 में केंद्र सरकार ने प्रदेश की कर्ज लेने की सीमा 6,342 करोड़ रुपए तय की थी, मगर इस अवधि में सरकार ने 9,043 करोड़ रुपए यानी तय सीमा से करीब 2,700 करोड़ रुपए अधिक कर्ज लिया है। वर्ष 2022-23 में केंद्र से प्रदेश को 9,377 करोड़ रुपए व वर्ष 2023-24 में 8,058 करोड़ रुपए राजस्व घाटा अनुदान के तौर पर मिले, मगर इन दोनों वर्षों में प्रदेश का राजस्व घाटा क्रमश: 6336 करोड़ रुपए और 5,559 करोड़ रुपए था। हैरानी की बात यह है कि राजस्व घाटा अनुदान के तौर पर मोटी राशि केंद्र से मिलने के बावजूद वर्ष 2023-24 में प्रदेश सरकार का राजकोषीय घाटा 11,266 करोड़ रुपए था। प्रतिबद्ध देनदारियों के बढ़ने की वजह से राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है।

इससे मुक्ति पाने के लिए राज्य सरकार अतिरिक्त ऋण लेने को विवश है। इस समय प्रदेश की आर्थिकी के आधार में से एक पन विद्युत योजनाओं को भी माना जाता है, लेकिन इससे संबद्ध बिजली बोर्ड करीब 3 हजार करोड़ रुपए तथा पॉवर कार्पोरेशन करीब 600 करोड़ से अधिक के घाटे में है। पर्यटन भी प्रदेश की आर्थिकी का मुख्य आधार रहा है, लेकिन आज हालात यह है कि सरकार को घाटे के चलते निगम के होटलों के निजीकरण करने की दिशा में आगे बढ़ना पड़ रहा है। प्रदेश सरकार को इस समय वेतन, पैंशन औैर ब्याज जैसी प्रतिबद्ध अदायगियों पर ही कुल बजट का 64 से 70 फीसदी तक व्यय करना पड़ रहा है। ऐसे में विकास कार्य के लिए धनराशि कम पड़ रही है।

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