Edited By Jyoti M, Updated: 24 Feb, 2026 04:05 PM

हिमाचल प्रदेश की सियासत में उस वक्त उबाल आ गया जब जनजातीय सलाहकार परिषद (TAC) के कद्दावर सदस्य सतीश शर्मा ने 'विकास की कछुआ चाल' और 'प्रशासनिक अनदेखी' का हवाला देते हुए अपने पद को त्याग दिया।
हिमाचल डेस्क। हिमाचल प्रदेश की सियासत में उस वक्त उबाल आ गया जब जनजातीय सलाहकार परिषद (TAC) के कद्दावर सदस्य सतीश शर्मा ने 'विकास की कछुआ चाल' और 'प्रशासनिक अनदेखी' का हवाला देते हुए अपने पद को त्याग दिया। यह महज एक इस्तीफा नहीं, बल्कि अपनी ही सरकार के खिलाफ एक अनुभवी नेता की खुली नाराजगी है, जिसने पांगी घाटी की राजनीतिक फिजाओं में हलचल मचा दी है।
क्यों उठा यह कदम? मुख्य आपत्तियां
सतीश शर्मा ने सीधे तौर पर मुख्यमंत्री को भेजे अपने ईमेल में सरकार की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया है। उनके इस्तीफे के पीछे ये प्रमुख कारण रहे। सतीश शर्मा का आरोप है कि पिछले तीन वर्षों में पांगी घाटी में विकास की बातें तो बहुत हुईं, लेकिन हकीकत में जमीन पर कुछ नहीं बदला। विशेष रूप से लोक निर्माण विभाग (PWD) में अधिशासी अभियंता (XEN) का पद सालों से रिक्त होने पर उन्होंने गहरी चिंता जताई।
उन्होंने सहायक अभियंता को वित्तीय शक्तियां सौंपने को नियम विरुद्ध और प्रशासनिक दृष्टिकोण से गलत करार दिया है। मिनी सचिवालय के लिए 55 लाख रुपये के फर्नीचर की खरीद में उन्होंने गड़बड़ी की आशंका जताते हुए इस पूरे मामले की जांच की मांग की है।
एक पुराने सिपाही की नाराजगी के गहरे मायने
सतीश शर्मा कांग्रेस के कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं हैं। दशकों से पार्टी के झंडे को थामे रखने वाले शर्मा की पहचान पांगी के एक कद्दावर और जमीनी नेता के रूप में है। वर्तमान में पंचायत प्रधान के रूप में कार्यरत होने के कारण उनकी जनता पर मजबूत पकड़ है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह इस्तीफा सिर्फ विकास कार्यों तक सीमित नहीं है। चूंकि मार्च में परिषद का कार्यकाल खत्म हो रहा था और नई नियुक्तियों की चर्चाएं गर्म थीं, ऐसे में शर्मा का यह कदम 'शक्ति प्रदर्शन' और 'नैतिक दबाव' का एक मिला-जुला रूप हो सकता है।