Edited By Jyoti M, Updated: 15 Jan, 2026 11:52 AM
आज जब हम पहाड़ों में बड़ी-बड़ी मशीनों से सुरंगें बनते देखते हैं, तो हमें आश्चर्य नहीं होता। लेकिन कल्पना कीजिए उस दौर की, जब न बिजली थी, न मशीनें और न ही कोई सरकारी मदद।
तीसा (सुभान दीन)। आज जब हम पहाड़ों में बड़ी-बड़ी मशीनों से सुरंगें बनते देखते हैं, तो हमें आश्चर्य नहीं होता। लेकिन कल्पना कीजिए उस दौर की, जब न बिजली थी, न मशीनें और न ही कोई सरकारी मदद। उस दौर में चम्बा के चुराह स्थित चांजू के एक साधारण से व्यक्ति राधा ने वह कर दिखाया, जिसे आज की दुनिया 'असंभव' मानती है। 1950 के दशक में चांजू क्षेत्र के लोगों का जीवन घराटों (पनचक्की) पर निर्भर था। अनाज पीसने के लिए यही एक साधन था।
लेकिन मानसून का सीजन अपने साथ तबाही लेकर आता था। भारी बारिश और बाढ़ में नाले किनारे बने घराट बह जाते थे। परिणाम यह होता था कि साल के 4 महीने लोगों को अनाज पिसवाने के लिए दर-दर भटकना पड़ता था या बिना आटे के गुजर-बसर करनी पड़ती थी। क्षेत्र व गांव वालों की इस बेबसी ने राधा जी के दिल को झकझोर दिया। उन्होंने इस समस्या का स्थायी समाधान निकालने का प्रण लिया। उन्होंने तय किया कि वह नाले के पानी को एक सुरक्षित स्थान पर ले जाएंगे, जहाँ बाढ़ का खतरा न हो।
लेकिन रास्ते में एक विशालकाय पहाड़ी दीवार बनकर खड़ी थी। जब राधा जी ने हाथ में छैनी और हथौड़ा उठाया, तो लोगों को उनका यह फैसला 'पागलपन' लगा। लोग हंसते थे कि एक अकेला इंसान पहाड़ कैसे काट सकता है। लेकिन राधा जी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। राधा की यह सुरंग केवल पानी का रास्ता नहीं है, बल्कि यह चुराह के गौरव और आत्मनिर्भरता का जीता-जागता स्मारक है।

संघर्ष के 4 साल का 'तप' और 60 मीटर का चमत्कार
बिना किसी आधुनिक उपकरण के, राधा जी ने 1963 में पहाड़ का सीना चीरना शुरू किया। 1967 तक लगातार 4 साल अंधेरी गुफा, कठोर पत्थर और अकेलेपन का संघर्ष किया। 1967 में जब सुरंग के दूसरे छोर से पानी की पहली धार निकली, तो पूरा क्षेत्र दंग रह गया। लगभग 60 मीटर लंबी इस सुरंग ने नाले के पानी को सुरक्षित घराटों तक पहुँचा दिया। इसके बाद न केवल अनाज पीसने की समस्या खत्म हुई, बल्कि उन्होंने पानी के उसी तेज बहाव से लकड़ी काटने का आरा भी चलाया, जो उस समय की बड़ी उपलब्धि थी।
'दशरथ मांझी' से कम नहीं संघर्ष की कहानी
चुराह क्षेत्र के चांजू निवासी राधा का संघर्ष दशरथ मांझी से कम नहीं है । एक तरफ दशरथ मांझी ने पहाड़ काटकर गांव के लिए रास्ता तैयार किया था। वहीं चुराह के राधा ने अपने क्षेत्र की समस्या के लिए पहाड़ में सुरंग बना दी। जिससे क्षेत्र के ग्रामीणों को 12 महीने अनाज पीसने की सुविधा मिली।
राधा के अदम्य साहस और गुमनाम नायक को सलाम
बिहार के गया जिले के दशरथ मांझी का नाम आज पूरी दुनिया जानती है। उनके संघर्ष पर फिल्में बनीं और उनकी मिसाल हर मंच पर दी जाती है। लेकिन हिमाचल के दुर्गम पहाड़ों के बीच चुराह (चांजू) में भी एक ऐसी ही शख्सियत हुए, जिन्होंने समाज के कल्याण के लिए अकेले ही पहाड़ का रास्ता बदल दिया था। एक ऐसा गुमनाम नायक जिनके अदम्य साहस के चर्चे आज भी चांजू की हवाओं में घुले हैं, लेकिन इतिहास के पन्नों में उन्हें वह जगह नहीं मिली जिसके वे हकदार थे।
भूख पर भारी पड़ा 'राधा' का संकल्प
1950 के दशक में जब चांजू क्षेत्र में बरसात का मौसम आता था, तो वह अपने साथ तबाही लाता था। उन्होंने एक सुरक्षित स्थान पर पानी पहुँचाने की ठानी, लेकिन रास्ते में एक विशाल चट्टान खड़ी थी। बिना किसी मशीनरी, बिना किसी सरकारी फंड और बिना किसी शोर-शराबे के, राधा जी ने हाथ में छैनी और हथौड़ा उठाया और पहाड़ से टकरा गए। राधा चार साल भूख प्यास की परवाह किये बगैर डटे रहे।
निर्भरता के दौर में 'आत्मनिर्भरता' का सबसे बड़ा सबक
आज का युग आधुनिक डिजिटल सुख-सुविधाओं का युग है। हम छोटी-छोटी जरूरतों के लिए मशीनों, बिजली और सरकारी तंत्र पर निर्भर हैं। लेकिन इसी चम्बा की मिट्टी के लाल राधा की कहानी हमें आईना दिखाती है कि असली ताकत साधनों में नहीं, बल्कि संकल्प में होती है। आज जहाँ हम इंटरनेट या बिजली के बिना एक दिन भी खुद को लाचार महसूस करते हैं, वहीं 1960 के दशक में चांजू के राधा जी ने अकेले ही वह कर दिखाया जो आज की आधुनिक मशीनें शायद महीनों में करें।
न मशीन, न बिजली: उस दौर में न तो खुदाई के लिए ड्रिलिंग मशीन थी और न ही रास्ता दिखाने के लिए रोशनी। न कोई बजट, न सरकारी मदद: उन्होंने किसी ग्रांट या सरकारी टेंडर का इंतज़ार नहीं किया। उनके पास बस एक छैनी, एक हथौड़ा और एक अटूट विचार था समाज को मुसीबतों और भूख से बचाना है।