रिपोर्ट ने चौंकाया! हिमाचल की वादियों में घुल रहा है प्रदूषण का जहर... इन इलाकों ने बढ़ाई चिंता

Edited By Jyoti M, Updated: 03 Jan, 2026 10:22 AM

the poison of pollution is spreading in the valleys of himachal pradesh

देवभूमि हिमाचल, जिसे कभी अपनी शुद्ध आबोहवा के लिए जाना जाता था, अब प्रदूषण की गिरफ्त में है। विडंबना यह है कि जिस राज्य के लोग पहाड़ों की ताजी हवा का लुत्फ उठाने आते थे, वहीं के औद्योगिक बेल्ट अब 'स्मॉग' की चादर लपेटे हुए हैं। ताजा आंकड़े बताते हैं...

हिमाचल डेस्क। देवभूमि हिमाचल, जिसे कभी अपनी शुद्ध आबोहवा के लिए जाना जाता था, अब प्रदूषण की गिरफ्त में है। विडंबना यह है कि जिस राज्य के लोग पहाड़ों की ताजी हवा का लुत्फ उठाने आते थे, वहीं के औद्योगिक बेल्ट अब 'स्मॉग' की चादर लपेटे हुए हैं। ताजा आंकड़े बताते हैं कि राज्य के प्रमुख औद्योगिक केंद्र—कालाअंब, पांवटा साहिब और बद्दी—अब प्रदूषण के नए हॉटस्पॉट बन चुके हैं।

सिरमौर में हवा का बिगड़ा मिजाज

सिरमौर जिले के औद्योगिक क्षेत्रों में वायु की गुणवत्ता चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई है। कालाअंब और पांवटा साहिब में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) क्रमशः 186 और 188 दर्ज किया गया है। यद्यपि तकनीकी रूप से इसे 'मध्यम' श्रेणी में रखा जाता है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह हवा बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा रोगियों के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है।

उद्योग नहीं, सड़कों की धूल है असली 'विलेन'

आमतौर पर प्रदूषण के लिए फैक्ट्रियों को जिम्मेदार ठहराया जाता है, लेकिन प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और आईआईटी कानपुर के एक संयुक्त अध्ययन ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। हिमाचल के प्रदूषित शहरों में हवा खराब होने की मुख्य वजह फैक्ट्रियों का धुआं नहीं, बल्कि सड़कों की धूल है।

अधूरी सड़कें: सड़कों के किनारों (शोल्डर्स) का पक्का न होना और कच्ची सड़कें धूल उड़ाने का मुख्य स्रोत हैं।

भारी ट्रैफिक: ट्रकों और बड़े वाहनों की निरंतर आवाजाही इस धूल को हवा में घुलाए रखती है।

मौसम की मार: सर्दियों में बारिश की कमी और थमी हुई हवा के कारण ये प्रदूषक कण जमीन के करीब ही जमा हो जाते हैं, जिससे दृश्यता और वायु गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं।

बजट और तकनीक की चुनौती

पर्यावरण इंजीनियर अतुल परमार के अनुसार, प्रदूषण की सटीक निगरानी में सबसे बड़ी बाधा भारी लागत है। एक आधुनिक 'रियल-टाइम' मॉनिटरिंग स्टेशन स्थापित करने में लगभग 2 करोड़ रुपये का निवेश और लाखों का वार्षिक रखरखाव खर्च होता है। इसी वित्तीय बोझ के कारण राज्य के कई हिस्सों में अभी भी पुराने 'मैनुअल' तरीके से डेटा इकट्ठा किया जाता है, जिसके परिणाम आने में 24 से 48 घंटे लग जाते हैं। देरी से मिलने वाला यह डेटा संकट के समय तत्काल कदम उठाने में बाधा बनता है।

बद्दी की स्थिति 'बेहद गंभीर'

सिरमौर के मुकाबले बद्दी औद्योगिक क्षेत्र की स्थिति कहीं अधिक भयावह है। वहां AQI 338 के पार जा चुका है, जो 'बहुत खराब' श्रेणी में आता है। बद्दी में रियल-टाइम स्टेशन होने के कारण वहां की हवा का सच हर मिनट सामने आ रहा है, जो प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती पेश कर रहा है।

समाधान: केवल एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं

प्रदूषण से जंग जीतने के लिए एक संयुक्त रणनीति की जरूरत है। अतुल परमार ने स्पष्ट किया है कि जब तक विभिन्न विभाग एक साथ मिलकर काम नहीं करेंगे, तब तक बदलाव नामुमकिन है:

लोक निर्माण विभाग (PWD): धूल रोकने के लिए सड़कों और उनके किनारों को दुरुस्त करना।

परिवहन विभाग (RTO): खटारा और धुआं उगलते वाहनों पर लगाम लगाना।

कृषि विभाग: पराली जलाने की घटनाओं पर अंकुश लगाना।

नगर निकाय: कचरे को खुले में जलाने से रोकना।

प्रदूषण बोर्ड: उद्योगों के उत्सर्जन मानकों पर पैनी नजर रखना।

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