Shimla: HRTC में वर्षों पहले बनाए गए ड्यूटी नियमों को बदलने पर अड़े कर्मचारी संगठन

Edited By Kuldeep, Updated: 09 Mar, 2026 09:27 PM

shimla hrtc duty rules

एचआरटीसी में वर्षों पहले बनाए गए ड्यूटी नियमों में अब बदलाव की जरूरत है। यह मांग निगम के 7 संगठनों ने प्रबंधन के समक्ष उठाई है। निगम कर्मचारियों ने मांग की है कि ड्यूटी की व्यवस्था को तकनीक से जोड़ा जाए।

शिमला (राजेश): एचआरटीसी में वर्षों पहले बनाए गए ड्यूटी नियमों में अब बदलाव की जरूरत है। यह मांग निगम के 7 संगठनों ने प्रबंधन के समक्ष उठाई है। निगम कर्मचारियों ने मांग की है कि ड्यूटी की व्यवस्था को तकनीक से जोड़ा जाए। इसी संबंध में सोमवार को 7 यूनियन परिवहन कर्मचारी महासंघ, परिवहन मजदूर संघ, एटक तकनीकी कर्मचारी संगठन, चालक परिचालक संगठन, निरीक्षक स्टाफ एसोसिएशन, सर्व कर्मचारी यूनियन के साथ निगम प्रबंधन ने बैठक की। बैठक की अध्यक्षता निगम मुख्य महाप्रबंधक पंकज सिंघल ने की।

बैठक में निगम प्रबंधन ने तीन प्रमुख प्रस्तावों चालक-परिचालकों की ड्यूटी के आकलन के लिए वर्तमान गति सीमा में वृद्धि करना, 48 घंटे साप्ताहिक ड्यूटी व्यवस्था लागू करना और वर्ष 2024 में लागू की गई लगेज पॉलिसी पर कर्मचारी प्रतिनिधियों से सुझाव मांगे थे। बैठक में यूनियन के प्रतिनिधियों ने कहा कि वर्ष 2006 में निगम प्रबंधन ने राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य राजमार्ग, ग्रामीण कच्ची-पक्की सड़कों के लिए अलग-अलग गति सीमाएं निर्धारित की थीं। इनके आधार पर चालक-परिचालकों की ड्यूटी, समय सारिणी और कार्य मूल्यांकन किया जाता रहा है। कई मार्गों पर वास्तविक यात्रा समय, कागजी गणना से अधिक लग रहा है। इसके बावजूद कागजों में कम समय निर्धारित किया जाता है जिससे चालक-परिचालकों पर अनावश्यक मानसिक दबाव बनता है और यह सड़क सुरक्षा की दृष्टि से भी उचित नहीं है।

बसों की तकनीकी स्थिति को भी ध्यान में रखे निगम
संगठनों ने कहा कि निगम के बेड़े में सभी बसें नई नहीं हैं। कई बसें पुरानी हैं और उनकी इंजन क्षमता, पिकअप, ब्रेकिंग सिस्टम तथा मैकेनिकल स्थिति नई बसों जैसी नहीं है। नई बसें बेहतर सस्पेंशन, अधिक शक्ति और आधुनिक तकनीक से लैस होती हैं, जबकि पुरानी बसें तीव्र चढ़ाई वाले मार्गों पर समान गति नहीं पकड़ पातीं और संकीर्ण या कच्ची सड़कों पर सुरक्षित संचालन में अधिक समय लेती हैं। ऐसी स्थिति में सभी मार्गों और सभी बसों पर एक समान बढ़ी हुई गति सीमा लागू करना व्यावहारिक और सुरक्षित नहीं माना जा सकता। कर्मचारी संगठनों ने सुझाव दिया है कि गति सीमा तय करते समय बसों की आयु, तकनीकी स्थिति और इंजन क्षमता को भी ध्यान में रखा जाए।

पहाड़ी व प्लेन क्षेत्रों में बसों के संचालन में अंतर
संगठन पदाधिकारियों ने बैठक में यह भी कहा कि प्रदेश के कई पर्वतीय और ग्रामीण मार्ग अत्यंत दुर्गम हैं। कुछ मार्गों पर लगभग 20 किलोमीटर की दूरी तय करने में करीब दो घंटे लग जाते हैं, जिससे औसत गति लगभग 10 किलोमीटर प्रति घंटा बनती है। वर्ष 2006 के आदेशों में इस प्रकार के मार्गों के लिए अलग गति सीमा निर्धारित नहीं की गई थी और प्रस्तावित नई गति सीमा में भी ऐसे दुर्गम मार्गों की वास्तविक परिस्थितियां स्पष्ट रूप से परिलक्षित नहीं होतीं। प्रदेश के कई ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कें संकीर्ण हैं, तीखे मोड़ हैं और सड़क की सतह भी खराब है, जहां अधिक गति से वाहन चलाना सुरक्षित नहीं है।

ये भी दिए संगठन पदाधिकारियों ने सुझाव
कर्मचारी संगठनों ने कहा कि कार्यालयों में कर्मचारियों की उपस्थिति बायोमीट्रिक प्रणाली से दर्ज की जाती है। परिवहन निगम की बसों में भी कई आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। बसों में जी.पी.एस. आधारित ट्रैकिंग प्रणाली लगी हुई है और परिचालकों के पास इलैक्ट्रॉनिक टिकटिंग मशीन होती है, जो ऑनलाइन प्रणाली से जुड़ी रहती है। प्रत्येक टिकट जारी होने का समय, प्रत्येक स्टॉप का समय और लेन-देन का पूरा विवरण डिजिटल रूप से रिकॉर्ड होता है और सर्वर पर सुरक्षित रहता है। ऐसी स्थिति में केवल अनुमानित गति सीमा के आधार पर ड्यूटी का आकलन करना उचित नहीं है। संगठनों ने सुझाव दिया कि जीपीएस और इटीएम के आंकड़ों को मिलाकर चालक-परिचालकों की वास्तविक ड्यूटी अवधि का आकलन किया जाए।

48 घंटे साप्ताहिक ड्यूटी व्यवस्था पर भी आपत्ति
कर्मचारी संगठनों ने 48 घंटे साप्ताहिक ड्यूटी व्यवस्था के प्रस्ताव पर भी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि मोटर ट्रांसपोर्ट वर्कर्स एक्ट 1961 के प्रावधानों के अनुसार सामान्यत: किसी भी वयस्क मोटर ट्रांसपोर्ट कर्मी से प्रतिदिन 8 घंटे और सप्ताह में 48 घंटे से अधिक कार्य नहीं लिया जा सकता। यदि किसी दिन 8 घंटे से अधिक कार्य लिया जाता है तो वह अवधि ओवरटाइम मानी जाती है और उसका भुगतान नियमानुसार किया जाना आवश्यक है। अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसमें एक दिन किए गए अतिरिक्त कार्य को दूसरे दिन की कम ड्यूटी से समायोजित किया जा सके।

लगेज पॉलिसी में बदलाव की मांग
वर्ष 2024 में लागू की गई नई लगेज पॉलिसी को लेकर भी कर्मचारी संगठनों ने असंतोष व्यक्त किया है। उनका कहना है कि इस नीति के कारण बसों में यात्रियों की संख्या पर असर पड़ा है और कई स्थानों पर यात्रियों व कर्मचारियों के बीच अनावश्यक विवाद भी सामने आए हैं। कर्मचारी प्रतिनिधियों ने सुझाव दिया है कि वर्ष 2024 से पहले लागू लगेज पॉलिसी को फिर से लागू किया जाए। इसके साथ ही यह प्रावधान जोड़ा जाए कि बिना यात्री भेजे जाने वाले सामान का किराया, यात्री के साथ भेजे जाने वाले सामान के टिकट से दोगुना निर्धारित किया जाए।

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