Edited By Kuldeep, Updated: 04 Nov, 2025 09:14 PM

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ प्रदेश प्रवक्ता त्रिलोक कपूर ने सुक्खू सरकार पर प्रदेश हित और लोकतांत्रिक मूल्यों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए निशाना साधा है।
शिमला (सौरभ): भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ प्रदेश प्रवक्ता त्रिलोक कपूर ने सुक्खू सरकार पर प्रदेश हित और लोकतांत्रिक मूल्यों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए निशाना साधा है। कपूर ने बयान जारी कर पंचायत व नगर निकाय चुनाव स्थगन की कोशिशों, धारा 118 में संशोधन के कथित प्रयासों, ठेकेदारों के भुगतान न होने और सहकारी संस्थाओं के चुनाव में सरकारी हस्तक्षेप सहित कई ज्वलंत मसलों को लेकर सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
कपूर ने कहा, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस सरकार पंचायतों के वार्ड पुनर्गठन के नाम पर लोकतंत्र के सबसे निचले पायदान यानी स्थानीय निकायों के चुनावों को टालने की हरसंभव कोशिश कर जनता के संवैधानिक अधिकारों का हनन कर रही है। सरकार को जनता के सामने जाने से डर लग रहा है, जो उसकी घटती लोकप्रियता का स्पष्ट प्रमाण है। यह सीधे तौर पर लोकतंत्र को स्थगित करने जैसा है।
वहीं, भूमि सुधार की धारा 118 में संभावित संशोधन के विचार को लेकर भी कपूर ने सरकार को चेतावनी दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह धारा हिमाचल की जमीन और पहचान की रक्षा करती है। इसमें किसी भी तरह के बदलाव से राज्य के मूल निवासियों के हितों को गहरा आघात लगेगा और भू-माफिया को बढ़ावा मिलेगा। कपूर ने सरकार से इस संवेदनशील विषय पर तुरंत अपनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की।
भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि राज्य के खस्ताहाल खजाने का सबसे बड़ा शिकार ठेकेदार वर्ग हो रहा है। उन्होंने कहा कि विकास कार्य होने के बावजूद ठेकेदारों को उनका बकाया भुगतान नहीं किया जा रहा है, जिससे वे आर्थिक संकट के भंवर में फंस गए हैं। सरकार की यह लेटलतीफी न सिर्फ ठेकेदारों को बर्बाद कर रही है, बल्कि समूचे प्रदेश में विकास कार्यों की गति को भी पूरी तरह रोक चुकी है। कपूर ने चेतावनी देते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी इन जन विरोधी फैसलों को बर्दाश्त नहीं करेगी व सरकार को जवाबदेह बनाने के लिए जनता के बीच जाकर संघर्ष करेगी।
सहकारी संस्थानों पर सरकारी नियंत्रण का प्रयास
त्रिलोक कपूर ने वूल फैडरेशन और कांगड़ा केंद्रीय सहकारी बैंक जैसे महत्वपूर्ण सहकारी संस्थानों के चुनाव स्थगित किए जाने को लेकर सरकार की मंशा पर संदेह जताया। उन्होंने कहा कि यह फैसला दर्शाता है कि सरकार इन संस्थानों पर राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करना चाहती है। उन्होंने कहा कि सहकारी संस्थाओं में हस्तक्षेप से इन संस्थानों की स्वायत्तता और विश्वसनीयता खतरे में पड़ गई है।