Edited By Kuldeep, Updated: 02 Feb, 2026 04:46 PM

चम्बा जिले का जनजातीय क्षेत्र पांगी अपनी अनूठी संस्कृति के लिए पूरे हिमाचल में मशहूर है। यहां भारी बर्फबारी और कड़ाके की ठंड के बीच रविवार को ऐतिहासिक खौउल उत्सव का आगाज हो गया है।
पांगी (वीरू): चम्बा जिले का जनजातीय क्षेत्र पांगी अपनी अनूठी संस्कृति के लिए पूरे हिमाचल में मशहूर है। यहां भारी बर्फबारी और कड़ाके की ठंड के बीच रविवार को ऐतिहासिक खौउल उत्सव का आगाज हो गया है। एक तरफ पूरी घाटी बर्फ की सफेद चादर में लिपटी हुई है, वहीं दूसरी तरफ अब पांगी में सर्दियों में त्यौहारी सीजन शुरू हो गया है। इस त्यौहार की शुरूआत के साथ ही पांगी के हर घर में रौनक लौट आई है।
खौउल उत्सव मनाने के पीछे एक बेहद दिलचस्प और पुरानी मान्यता जुड़ी हुई है। पांगी के बुजुर्ग बताते हैं कि सर्दियों के दिनों में घाटी में बुरी शक्तियों या राक्षसों का राज हो जाता है। इन्हीं बुरी शक्तियों को अपने क्षेत्र से भगाने के लिए यह त्यौहार मनाया जाता है। रविवार को अलग-अलग पंचायतों में लोगों ने विशेष पूजा के बाद अपने घरों से जलती हुई मशालें निकालीं।
माना जाता है कि मशाल की आग की रोशनी से बुरी आत्माएं भाग जाती हैं। इस दौरान लोगों ने अपने पूर्वजों को भी याद करके सुख-समृद्धि की कामना की। पांगी घाटी में इस त्यौहार को अलग-अलग तारीख में मनाया जाता है। इस उत्सव का आगाज सबसे पहले जम्मू बॉर्डर के साथ लगते पांगी के आखिरी गांव सुराल से किया जाता है। इसके बाद धीरे-धीरे यह जश्न पूरी घाटी में फैलता है। सुराल, धरवास, लुज में इस उत्सव को एक माह पहले मना लिया गया है।
वहीं अब मुख्यालय किलाड़, मिंधल, साच, कुमार, परमार, फिंडरू और कुलाल जैसे गांव में खौउल उत्सव धूमधाम से मनाया गया। हर गांव के लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा में सज-धज कर इस उत्सव को मनाया जाता है। साच पंच नाग देवता के चेला इंद्र सिंह ने बताया कि खौउल उत्सव की शुरूआत के बाद इसके ठीक 15 दिन बाद पांगी का सबसे बड़ा त्यौहार जुकारू पर्व शुरू होगा, जिसका इंतजार हर पांगीवासी को साल भर रहता है। फिलहाल, खौउल के मौके पर घाटी में दावतों का दौर जारी है। हर घर में मंडे, हलवा, पूरी, चावल, कढ़ी और दाल जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जा रहे हैं।