हिमालय में पिघलते ग्लेशियरों ने बढ़ाई धड़कन: इन 4 झीलों पर मंडराया खतरा, फटने से पहले मिलेगा अलर्ट

Edited By Jyoti M, Updated: 12 Feb, 2026 12:49 PM

melting glaciers in the himalayas raise the pulse

हिमाचल प्रदेश के ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का असर अब खतरनाक रूप लेने लगा है। बढ़ते तापमान के कारण तेजी से पिघलते ग्लेशियरों ने कुल्लू, लाहौल-स्पीति और किन्नौर जिलों में ऐसी झीलों का निर्माण किया है, जो भविष्य में ग्लेशियर लेक...

हिमाचल डेस्क। हिमाचल प्रदेश के ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का असर अब खतरनाक रूप लेने लगा है। बढ़ते तापमान के कारण तेजी से पिघलते ग्लेशियरों ने कुल्लू, लाहौल-स्पीति और किन्नौर जिलों में ऐसी झीलों का निर्माण किया है, जो भविष्य में ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) यानी 'झील फटने' जैसी भीषण तबाही का कारण बन सकती हैं। इस आसन्न संकट को देखते हुए केंद्र सरकार और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने बचाव की कवायद तेज कर दी है।

चार प्रमुख झीलों पर कड़ी निगरानी

विशेषज्ञों ने प्रदेश की चार झीलों को 'अति संवेदनशील' श्रेणी में रखा है। इन क्षेत्रों में अब सैटेलाइट आधारित अत्याधुनिक 'अर्ली वार्निंग सिस्टम' लगाए जा रहे हैं।

वासुकी झील (कुल्लू): पार्वती घाटी में स्थित यह झील 14,770 फीट की ऊंचाई पर है।

गिपांग झील (लाहौल-स्पीति): 13,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित यह झील 92 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैल चुकी है।

बास्पा झील (किन्नौर): सांगला घाटी में स्थित इस झील का आकार लगातार बढ़ रहा है।

कलका झील (किन्नौर): सतलुज बेसिन में स्थित यह झील भी निचले इलाकों के लिए बड़ा खतरा है।

कैसे काम करेगा यह सिस्टम?

यह नई प्रणाली पूरी तरह से सैटेलाइट पर आधारित होगी। यदि झील के जलस्तर में अचानक वृद्धि होती है, ग्लेशियर का कोई हिस्सा टूटकर गिरता है या कोई अन्य असामान्य हलचल होती है, तो यह सिस्टम तुरंत अलर्ट जारी करेगा। यह सूचना सीधे मौसम विभाग और जिला प्रशासन के पास पहुंचेगी, जिससे प्रभावित होने वाले निचले क्षेत्रों को समय रहते खाली कराया जा सकेगा।

बढ़ता जोखिम और भविष्य की चुनौतियां

NDMA ने हिमालयी क्षेत्र में जोखिम वाली झीलों की सूची को 56 से बढ़ाकर 195 कर दिया है, जिसमें हिमाचल के अलावा सिक्किम, लद्दाख और उत्तराखंड जैसे राज्य शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन झीलों की समय पर निगरानी नहीं की गई, तो चंद्रा, पार्वती और सतलुज जैसी नदियों में अचानक आने वाली बाढ़ जान-माल का भारी नुकसान कर सकती है।

लाहौल के लिए जरूरी उपकरण पहले ही पहुंच चुके हैं और मौसम सामान्य होते ही इन्हें स्थापित करने का कार्य शुरू कर दिया जाएगा।

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