Edited By Jyoti M, Updated: 16 Apr, 2026 02:51 PM

हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में स्थित घेपन झील की सुरक्षा और संभावित खतरों से निपटने के लिए एक बड़ी राष्ट्रीय पहल शुरू की गई है। हाल ही में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) की एक उच्च स्तरीय टीम ने सिस्सू का दौरा किया।
हिमाचल डेस्क। हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में स्थित घेपन झील की सुरक्षा और संभावित खतरों से निपटने के लिए एक बड़ी राष्ट्रीय पहल शुरू की गई है। हाल ही में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) की एक उच्च स्तरीय टीम ने सिस्सू का दौरा किया।
यहाँ एनडीएमए के सचिव मनीष भारद्वाज और सदस्य डॉ. दिनेश कुमार असवाल ने लाहौल-स्पीति के उपायुक्त और अन्य अधिकारियों के साथ बैठक की। बर्फबारी के कारण टीम झील तक तो नहीं जा सकी, लेकिन आगामी रणनीति पर विस्तार से चर्चा की गई।
इस झील पर राज्य का पहला सैटेलाइट आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम (Early Warning System) स्थापित किया जाएगा, जो आपदा आने से पहले ही चेतावनी जारी कर देगा।
कैसे काम करेगा यह सिस्टम?
यह एक पायलट प्रोजेक्ट है जिसे सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत शुरू किया जा रहा है। यदि झील में कोई ग्लेशियर टूटता है या पानी का स्तर अचानक बढ़ता है, तो यह अत्याधुनिक सिस्टम तुरंत प्रशासन को सिग्नल भेज देगा। इससे अचानक आने वाली बाढ़ (GLOF) और भूस्खलन जैसी स्थितियों में लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा।
इन संस्थाओं का है संयुक्त प्रयास
इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट में कई बड़ी एजेंसियां सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC), राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), केंद्रीय जल आयोग (CWC), लाहौल-स्पीति जिला प्रशासन मिलकर काम कर रही हैं।
क्यों है घेपन झील से खतरा?
इसरो (ISRO) ने उन झीलों की एक सूची तैयार की है जिनसे भविष्य में खतरा हो सकता है, और घेपन झील उनमें से एक है। यह झील समुद्र तल से करीब 13,615 फीट की ऊंचाई पर है और इसकी गहराई 100 मीटर से भी अधिक है। जलवायु परिवर्तन और बर्फ पिघलने के कारण इस हिमनद झील का आकार लगातार बड़ा हो रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह झील टूटती है, तो इसका पानी सीधे चंद्रा नदी में जाएगा। इससे लाहौल के गांवों के साथ-साथ अटल टनल और मनाली-लेह नेशनल हाईवे को भारी नुकसान हो सकता है।
अगला कदम
विशेषज्ञों की तकनीकी टीम ने पहले ही झील का मुआयना कर लिया है। जल्द ही यहाँ सैटेलाइट आधारित सिस्टम स्थापित कर दिया जाएगा, जिससे मौसम विभाग और स्थानीय प्रशासन को किसी भी खतरे की पूर्व सूचना प्राप्त हो सकेगी।