हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: अब दूसरी पत्नी भी हो सकती है पेंशन की हकदार

Edited By Jyoti M, Updated: 03 Apr, 2026 08:35 AM

himachal high court verdict second wife can now also be entitled to a pension

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पारिवारिक पेंशन के एक मामले में मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी की पहली पत्नी की मृत्यु उसके जीवित रहते ही हो गई हो और पेंशन का कोई...

हिमाचल डेस्क। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पारिवारिक पेंशन के एक मामले में मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी की पहली पत्नी की मृत्यु उसके जीवित रहते ही हो गई हो और पेंशन का कोई अन्य दावेदार न हो, तो दूसरी पत्नी को पेंशन के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एक ऐसे कर्मचारी से जुड़ा है जिसकी दूसरी पत्नी ने पेंशन के लिए याचिका दायर की थी। कर्मचारी ने याचिकाकर्ता से शादी तब की थी जब उसकी पहली पत्नी जीवित थी। पहली पत्नी की कोई संतान नहीं थी और उनका निधन साल 2015 में हो गया था। इसके बाद, साल 2021 में कर्मचारी की भी मृत्यु हो गई। दूसरी पत्नी से कर्मचारी के दो बच्चे हैं।

सरकार का रुख और कोर्ट की टिप्पणी

राज्य सरकार ने फरवरी 2022 में दूसरी पत्नी के पेंशन दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह विवाह तब हुआ जब पहली पत्नी जीवित थी, जो कानूनी रूप से मान्य नहीं है। हालांकि, न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि पहली पत्नी की मृत्यु कर्मचारी के जीवनकाल में ही हो गई थी और उनका कोई वारिस नहीं है।

याचिकाकर्ता के अलावा पेंशन पर दावा करने वाला कोई दूसरा पक्ष नहीं है, जिससे किसी के हितों को नुकसान नहीं पहुँच रहा। यदि एक पुरुष और महिला लंबे समय तक साथ रहते हैं, तो कानून उनके विवाह की वैधता को स्वीकार कर सकता है।

अदालत का आदेश

हाईकोर्ट ने सरकार के पुराने आदेश को रद्द करते हुए विभाग को तुरंत पेंशन जारी करने का निर्देश दिया है। कोर्ट के आदेश है कि याचिकाकर्ता को मई 2026 से नियमित मासिक पेंशन दी जाए। पिछले सभी बकाये का भुगतान 3 महीने के भीतर करना होगा। यदि विभाग 3 महीने के अंदर भुगतान नहीं करता है, तो उसे बकाया राशि पर 6% वार्षिक ब्याज देना होगा। यह फैसला उन मामलों में एक मिसाल बनेगा जहाँ कानूनी तकनीकीताओं के कारण आश्रितों को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है।

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