Edited By Kuldeep, Updated: 03 Mar, 2026 06:40 PM

हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार इन दिनों प्रदेश के विकास की रफ्तार नापने की बजाय शायद बीपीएल चयन के पैमानों को नापने में ज्यादा व्यस्त दिखाई दे रही है।
डाडासीबा (सुनील): हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार इन दिनों प्रदेश के विकास की रफ्तार नापने की बजाय शायद बीपीएल चयन के पैमानों को नापने में ज्यादा व्यस्त दिखाई दे रही है। नीतिगत स्थिरता की कमी का आलम यह है कि पिछले एक साल के भीतर सरकार ने अपने ही नियमों को पांचवीं बार बदलते हुए एक नया 'यू-टर्न' रिकॉर्ड कायम कर दिया है। सरकार की इस कार्यप्रणाली को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे बीपीएल की सूची कोई जनहितकारी दस्तावेज न होकर किसी स्कूल की रफ कॉपी हो, जिस पर हर दूसरे महीने रबर फेरकर नई इबारत लिख दी जाती है। ताजा अधिसूचना के अनुसार अब मनरेगा में मात्र 50 दिन पसीना बहाने वाले परिवारों को भी गरीबी रेखा के नीचे जगह मिल जाएगी, जबकि साल भर पहले इसी सरकार को लगता था कि 100 दिन से कम काम करने वाले गरीब नहीं हो सकते।
सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि जब 100 दिन की शर्त पर बीपीएल का आंकड़ा सरकार की उम्मीदों के मुताबिक नहीं बढ़ पाया तो आनन-फानन में इसे अस्सी दिन किया गया और अब जब लक्ष्य फिर भी दूर दिखा तो इसे घटाकर 50 दिन पर टिका दिया गया है। नियमों में यह 'उदारता' ग्रामीण विकास के प्रति संवेदना है या फिर गिरते जनाधार को थामने की कोई कवायद, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
वहीं बीडीओ प्रागपुर अशोक कुमार का कहना है कि अब ऐसे परिवार जिनके सभी वयस्क सदस्यों ने पिछले वित्तीय वर्ष के दौरान मनरेगा के अंतर्गत कम से कम 50 दिन का रोजगार प्राप्त किया है, वे बीपीएल श्रेणी में शामिल होने के पात्र माने जाएंगे।