Mandi: भर्ती और सेवा शर्तें कानून 2024 पर न्यायालय का फैसला सुक्खू सरकार की असंवैधानिक नीति पर तमाचा : जयराम

Edited By Kuldeep, Updated: 25 Apr, 2026 09:30 PM

mandi recruitment court decision

पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा कि आज हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा सुक्खू सरकार के हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारियों की भर्तियों की सेवा की शर्तें विधेयक 2024 को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया।

मंडी (ब्यूरो): पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा कि आज हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा सुक्खू सरकार के हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारियों की भर्तियों की सेवा की शर्तें विधेयक 2024 को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया। इससे पहले भी सरकार द्वारा यह कानून लाया गया था ताकि हिमाचल प्रदेश के कर्मचारियों के अनुबंध कार्यकाल और सीनियोरिटी की सेवा शर्तों को बदला जा सके। पूर्व में हिमाचल के मुख्य न्यायाधीश एमएस रामचंद्र राव की अगुवाई वाली खंडपीठ ने इसे खारिज कर दिया था। कर्मचारियों का हक छीनने के लिए सरकार सुप्रीम कोर्ट गई, वहां पर भी सरकार को हार का सामना करना पड़ा। सरकार ने इसके बाद भी हार नहीं मानी। इसके बाद मुख्यमंत्री ने धर्मशाला के शीतकालीन सत्र-2024 में इस बिल को लाकर फिर से पास कराया। संख्या बल में ज्यादा होने के कारण भारतीय जनता पार्टी के भारी विरोध के बाद भी यह बिल पास हुआ। उस समय भी हमने इस कानून का विरोध करते हुए इसे रेट्रोस्पेक्टिव लागू करने का विरोध किया था और साफ कहा था कि यह बिल न्यायालय द्वारा खारिज कर दिया जाएगा और इससे सदन की गरिमा गिरेगी।

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री और उनकी पूरी मंडली प्रदेश और देश भर में घूम-घूम कर खुद को कर्मचारी हितैषी होने का ढोल पीटती है, लेकिन जब भी मौका मिलता है तो कर्मचारियों के साथ हर प्रकार का अन्याय करती है। सरकार का यह फैसला कर्मचारियों के हितों को प्रभावित करने वाला था। मुख्यमंत्री जानबूझकर कर्मचारियों के खिलाफ इस तरीके का कानून लेकर आए जिससे उनकी देनदारियां आने वाली सरकारों पर टाली जा सकें। आज भी सरकार की इस कुटिलता पर माननीय उच्च न्यायालय द्वारा पानी फेर दिया गया। भारतीय जनता पार्टी सुक्खू सरकार के इस असंवैधानिक फैसले के खारिज होने का स्वागत करती है। यह सरकार एक बार नहीं, बार-बार माननीय न्यायालय में अपने फैसलों और कानूनों को लेकर असंवैधानिक साबित हो चुकी है।

उन्होंने कहा कि विडंबना यह है कि कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्त्ता पूरे देश में संविधान की किताब लेकर घूमते हैं और हिमाचल प्रदेश में उनकी ही पार्टी की सरकार संविधान की हर दिन धज्जियां उड़ाती है। पिछले हफ्ते ही हाईकोर्ट ने सुक्खू सरकार द्वारा बागी विधायकों की पैंशन रोकने के कानून को भी रद्द कर दिया था। इससे पहले हिमाचल द्वारा बनाए गए वाटर कमीशन को असंवैधानिक घोषित किया गया था। सरकार द्वारा प्रदेश की जनता पर थोपे गए सीपीएस की नियुक्तियों को अवैध घोषित किया गया था। लोगों की बिजली बढ़ाने के फैसले को पलट दिया गया था। पंचायत चुनाव के मामले में अब तक सरकार को छह बार फटकार पड़ चुकी है। सलाहकारों और वकीलों की भारी-भरकम फौज रखने के बाद भी सुक्खू सरकार न्यायालय में आए दिन अपने नीतिगत फैसलों में हारती है। यह इस कारण है क्योंकि मुख्यमंत्री का कोई भी फैसला कानून के नजरिये से नहीं होता है।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि जितनी बार भी न्यायालय में किसी भी सदन द्वारा बनाया गया कानून रद्द होता है, असंवैधानिक साबित होता है, उतनी बार उस सदन की गरिमा गिरती है जिसने उस कानून को पास किया है। मुख्यमंत्री खुद को लॉ स्टूडैंट बताते हैं, बहुत पढ़ा-लिखा और पढ़ने-लिखने वाला मुख्यमंत्री बताते हैं, उसके बाद भी ऐसी स्थिति है। स्पीकर महोदय भी कानूनविद हैं। इस तरीके के असंवैधानिक कानून का कोई औचित्य नहीं होता। इसके बाद भी स्पीकर महोदय सरकार को रोकने की बजाय उनका संरक्षण करते हैं। जब यह विधेयक चर्चा में आया तब भारतीय जनता पार्टी ने इसका विरोध किया और सरकार को चेताया भी था कि जिस प्रकार सरकार को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में फटकार लगी है, उसी प्रकार की फटकार फिर लगेगी, लेकिन तुगलकी फैसले लेने में माहिर मुख्यमंत्री इस बात को सुनने को तैयार नहीं थे।

प्रदेश सरकार ने करोड़ों रुपए कानूनी लड़ाई में वकीलों पर खर्च किए, जो ज्यादातर मुख्यमंत्री के मित्र और करीबी हैं। परिणाम सबके सामने है। मुख्यमंत्री यह लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक ले जाएं और वकीलों पर फिर से करोड़ों रुपए खर्च करें। मुख्यमंत्री से मेरा आग्रह है कि वह इस तरीके के तुगलकी फैसले लेने से बाज आएं और यदि विपक्ष उन्हें उनके फैसलों के असंवैधानिक होने की जानकारी दे तो अपने फैसले वापस भी ले लें।

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