Himachal: जब दुनिया मुंह फेर ले... तब हेमंत शर्मा बनते हैं सहारा, जानिए अनोखा संघर्ष

Edited By Jyoti M, Updated: 20 Mar, 2026 02:23 PM

hemant sharma upholds the religion of humanity

यह कहानी उस इंसान की है, जो वहां से अपनी जिम्मेदारी शुरू करता है जहां दुनिया साथ छोड़ देती है। एक ऐसी दुनिया में जहां लोग अपनों के लिए भी समय नहीं निकाल पाते, हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब में एक शख्स 'अजनबियों' का सगा बनकर खड़ा है।

हिमाचल डेस्क। यह कहानी उस इंसान की है, जो वहां से अपनी जिम्मेदारी शुरू करता है जहां दुनिया साथ छोड़ देती है। एक ऐसी दुनिया में जहां लोग अपनों के लिए भी समय नहीं निकाल पाते, हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब में एक शख्स 'अजनबियों' का सगा बनकर खड़ा है।

हेमंत शर्मा और सम्मानजनक विदाई का सफर

क्या आपने कभी सोचा है कि उन लोगों का क्या होता होगा जिनका इस दुनिया में कोई नहीं? वो जो सड़क किनारे या किसी हादसे में अपनी आखिरी सांस लेते हैं और उनकी पहचान तक खो जाती है। ऐसे 'लावारिस' कहे जाने वाले शवों के लिए हेमंत शर्मा एक फरिश्ता बनकर सामने आते हैं। वह उन चिताओं को अग्नि देते हैं, जिनके पास रोने वाला कोई नहीं होता।

एक झकझोर देने वाली शुरुआत

हेमंत के इस कठिन मार्ग पर चलने की कहानी किसी संस्था या सरकारी आदेश से नहीं, बल्कि एक गहरी टीस से शुरू हुई। वर्षों पहले एक लावारिस शव को घंटों लाचारी की हालत में पड़े देख उनका दिल पसीज गया। दुनिया जिस शव से मुंह फेरकर निकल रही थी, हेमंत ने उसे सम्मान देने का संकल्प लिया। साल 2014 में यमुना के किनारे गुरु गोविंद सिंह जी की तपस्थली, पांवटा साहिब से उन्होंने इस सेवा का आगाज किया।

अनोखी शर्त और पारिवारिक संकल्प

हेमंत की समाजसेवा की गहराई का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने विवाह के लिए भी वही हमसफर चुनी, जिसने उनके इस मिशन में कंधे से कंधा मिलाकर चलने का वादा किया। आज यह केवल हेमंत का जुनून नहीं, बल्कि उनके पूरे परिवार की प्रतिज्ञा बन चुका है।

हेमंत शर्मा का काम केवल मुखाग्नि देने तक सीमित नहीं है। वह पूरी प्रक्रिया को बड़ी संजीदगी से निभाते हैं। हर शव को पूरे रीति-रिवाज, नए कफन और विधिपूर्वक अंतिम विदाई दी जाती है।

वह हर मृतक का फोटो रिकॉर्ड रखते हैं। पुलिस के सहयोग से बिसरा सुरक्षित रखवाया जाता है ताकि भविष्य में अगर कभी कोई परिजन ढूंढते हुए आए, तो उन्हें अपने बिछड़े हुए सदस्य की जानकारी मिल सके।

कई बार शव ऐसी स्थिति में होते हैं जिन्हें देख पाना भी मुश्किल होता है, लेकिन हेमंत के लिए वह 'गंदगी' नहीं, बल्कि एक इंसान का अस्तित्व है।

खौफ नहीं, सुकून का रिश्ता

अक्सर लोग श्मशान और लाशों से डरते हैं, लेकिन हेमंत की सोच अलग है। वह बड़ी सादगी से कहते हैं कि डर तो जीवित लोगों के व्यवहार से लगता है, ये शांत आत्माएं तो बस सम्मान की हकदार हैं। बिना किसी पुरस्कार या प्रचार की लालसा के, वह अब तक अनगिनत अनाम जिंदगियों को 'मोक्ष' दिला चुके हैं।

"इंसानियत का सबसे बड़ा इम्तिहान वही है, जहाँ आपको पता हो कि बदले में धन्यवाद कहने वाला भी कोई नहीं बचेगा।"

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