Edited By Vijay, Updated: 12 Mar, 2026 07:25 PM

हरे सोने से सुसज्जित हिमाचल प्रदेश में जहां प्रदेश सरकार हरित आवरण बढ़ाने के लिए राजीव गांधी वन संवर्धन योजना चला रही है, वहीं विकास खंड गगरेट के अम्बोटा गांव में.....
गगरेट (बृज): हरे सोने से सुसज्जित हिमाचल प्रदेश में जहां प्रदेश सरकार हरित आवरण बढ़ाने के लिए राजीव गांधी वन संवर्धन योजना चला रही है, वहीं विकास खंड गगरेट के अम्बोटा गांव में वन विभाग की नाक तले ही बहुमूल्य खैर के दर्जनों पेड़ों को काटने का मामला सामने आया है। अम्बोटा गांव के जंगल से सटी सरकारी भूमि पर बड़े पैमाने पर खैर के पेड़ों के कटान से वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।
हैरत की बात यह है कि सरकारी जमीन पर इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों का कटान हो गया, लेकिन वन विभाग कुंभकर्णी नींद सोता रहा। कटान के बाद भी न तो विभाग हरकत में आया है और न ही इस मामले में पुलिस थाने में कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज करवाई गई है। स्थानीय लोगों में अब यह चर्चा आम हो गई है कि वनों की रक्षा करने वाले विभाग की इस सुस्त कार्यप्रणाली के बीच प्रदेश सरकार की राजीव गांधी वन संवर्धन योजना आखिर कैसे सफल होगी?
बता दें कि जिला ऊना के जंगल अव्वल दर्जे के खैर के पेड़ों के लिए पूरे प्रदेश में जाने जाते हैं। इन पेड़ों से तैयार होने वाला कत्था गुणवत्ता के लिहाज से देशभर में खास पहचान रखता है। बाजार में खैर की लकड़ी ऊंचे दामों पर बिकती है, जिसके चलते जिले के जंगल अक्सर वन माफिया के निशाने पर रहते हैं। खैर के पेड़ों को काटने के लिए भी सख्त नियम बनाए गए हैं। निजी भूमि पर उगे खैर के पेड़ भी मालिक बिना वन विभाग की अनुमति के नहीं काट सकता।
निर्धारित प्रक्रिया के तहत करीब 10 वर्ष बाद ही खैर के पेड़ों के कटान की अनुमति दी जाती है। इसके लिए वन व राजस्व विभाग के कर्मचारी मौके पर पेड़ों की शुमारी करते हैं और नंबरिंग के बाद ही कटान की अनुमति मिलती है, लेकिन जिस खैर के पेड़ को काटने के लिए इतनी सख्त प्रक्रिया अपनानी पड़ती है, उसी खैर के पेड़ों को अम्बोटा में सरकारी भूमि से बड़े पैमाने पर काट दिया गया। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वन विभाग की नियमित निगरानी क्यों नहीं हो पाई।
जब इस कटान के बारे में फोरैस्ट रेंज अफसर राहुल ठाकुर से बात की गई तो उन्होंने कहा कि यदि सरकारी भूमि पर खैर के पेड़ों का अवैध कटान हुआ है, तो इसकी मौके पर जाकर जांच करवाई जाएगी और नियमों के अनुसार सख्त कार्रवाई अमल में लाई जाएगी। अब देखना यह है कि यह जांच कब शुरू होती है और वन माफिया तक पुलिस के हाथ पहुंच पाते हैं या नहीं।
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