Mandi: काम करवाकर पैसे दबा बैठी थी कंपनी, फिर कोर्ट ने सिखाया ऐसा सबक; अब ब्याज समेत भरने होंगे ₹57 लाख

Edited By Vijay, Updated: 14 Jan, 2026 05:08 PM

company will have to pay 57 lakh rupees including interest

मंडी की सीनियर सिविल जज की अदालत ने व्यापारिक लेन-देन और अनुबंध के उल्लंघन से जुड़े एक अहम मामले में वादी अनीता कुमारी के पक्ष में फैसला सुनाया है।

मंडी (रजनीश): मंडी की सीनियर सिविल जज की अदालत ने व्यापारिक लेन-देन और अनुबंध के उल्लंघन से जुड़े एक अहम मामले में वादी अनीता कुमारी के पक्ष में फैसला सुनाया है। अदालत ने प्रतिवादी कंपनी कोस्टल प्रोजैक्ट्स लिमिटेड को आदेश दिया है कि वह वादी को 57,14,515 रुपए की बकाया राशि का तत्काल भुगतान करे। इसके साथ ही अदालत ने कंपनी को मुकद्दमा दायर करने की तारीख से लेकर भुगतान होने तक 18 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का भी निर्देश दिया है।

यह विवाद कुल्लू जिले के सैंज स्थित पार्वती जलविद्युत परियोजना स्टेज-2 के टनल निर्माण कार्य से जुड़ा है। वादी अनीता कुमारी, जो खुदाई मशीनों की मालिक हैं, ने वर्ष 2011 से 2014 के बीच अलग-अलग वर्क ऑर्डर के तहत अपनी मशीनें कोस्टल प्रोजैक्ट्स लिमिटेड को किराए पर दी थीं। आरोप था कि काम पूरा हो जाने के बावजूद कंपनी ने उनका भुगतान रोक लिया। कंपनी ने वादी के खाते से टीडीएस और सुरक्षा राशि तो काट ली, लेकिन वास्तविक बकाया राशि का भुगतान नहीं किया।

सुनवाई के दौरान कंपनी ने अदालत में तर्क दिया कि वादी की मशीनें खराब हालत में थीं, जिससे काम ठीक से नहीं हो पाया। हालांकि, अदालत ने पाया कि कंपनी अपने इन आरोपों को साबित करने के लिए कोई भी ठोस सबूत या गवाह पेश करने में नाकाम रही। फैसला सुनाते हुए अदालत ने कंपनी की लापरवाही पर तीखी टिप्पणी की। कोर्ट ने नोट किया कि कंपनी ने अपनी बात साबित करने के लिए किसी भी गवाह को कटघरे में नहीं उतारा। कानूनन, यदि कोई पक्ष क्रॉस-एग्जामिनेशन के लिए पेश नहीं होता, तो उसका पक्ष कमजोर या झूठा माना जाता है।  वादी द्वारा भेजे गए कानूनी नोटिसों का कंपनी ने कोई जवाब नहीं दिया, जिसे कोर्ट ने कंपनी द्वारा अपनी देनदारी की मौन स्वीकृति माना। 1 सितम्बर, 2015 को कंपनी द्वारा जारी कन्फर्मेशन ऑफ अकाऊंट्स को अदालत ने सबसे ठोस सबूत माना, जिसमें कंपनी ने खुद स्वीकार किया था कि उसे अनीता कुमारी का पैसा चुकाना है।

तमाम सबूतों और दलीलों को देखने के बाद अदालत ने वादी के पक्ष को मजबूत माना। कोर्ट ने 4 अलग-अलग वर्क ऑर्डर्स के तहत कुल 57,14,515 रुपए की डिक्री पारित की। इस राशि में मुख्य बकाया, सुरक्षा राशि और ब्याज शामिल है। यह फैसला उन कंपनियों के लिए एक सबक है जो काम करवाने के बाद भुगतान में आनाकानी करती हैं।

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