हिमाचल में आम सहित 6 प्रजातियों के पेड़ कटान पर लगा प्रतिबंध

Edited By Vijay, Updated: 29 Aug, 2023 08:11 PM

ban on felling of 6 species of trees including mango

हिमाचल प्रदेश सरकार इमारती व ईंधन की लकड़ी की तस्करी व चोरी को रोकने के लिए कड़े कदम उठा रही है। इस कड़ी में सरकार ने आम सहित 6 प्रजातियों के पेड़ों के कटान पर तुरंत प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया है।

शिमला (भूपिन्द्र): हिमाचल प्रदेश सरकार इमारती व ईंधन की लकड़ी की तस्करी व चोरी को रोकने के लिए कड़े कदम उठा रही है। इस कड़ी में सरकार ने आम सहित 6 प्रजातियों के पेड़ों के कटान पर तुरंत प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया है। जिन प्रजातियों के पेड़ों को काटने पर तुरंत प्रभाव से प्रतिबंध लगाया गया है, उनमें आम, त्रियांबल (फिकस प्रजाति), तुनी (तूना सिलियाटा), पदम या पाजा (रूनस सेरासस), रीठा (सैपिंडस मुकोरोसी) और बान (क्वेरकस ल्यूकोट्राइकोफोरा) के पेड़ शामिल हैं। नए आदेशों के तहत इन 6 प्रजातियों को वन विभाग के 10 वर्षीय कटाई कार्यक्रम के तहत लाया गया है। इसके तहत अब इन पेड़ों को केवल वन विभाग की अनुमति के बाद ही काटा जा सकता है। हालांकि नए नियम के तहत घरेलू कार्यों के लिए एक वर्ष में अधिकतम 5 पेड़ों को काटने की अनुमति रहेगी। इसके अलावा राज्य के बाहर सभी तरह की प्रजाति की इमारती लकड़ी और ईंधन की लकड़ी को ले जाने पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा, जिसका उद्देश्य हिमाचल प्रदेश से लकड़ी की तस्करी पर अंकुश लगाना और राज्य के मूल्यवान संसाधनों को बचाना है।

13 पेड़ प्रजातियों को होगी काटने की अनुमति
वन विभाग 13 पेड़ प्रजातियों की एक संशोधित सूची अधिसूचित कर दी है। इसमें काला सरीह, सफेदा, पापूलर, इंडियन विलो, बांस, पाइक/कुई कोष/न्यून, खिड़क, दरक, टीक, अर्जुन, सिंबल, ब्यूल व कामाला प्रजाति के पेड़ शामिल हैं। इन्हें निजी भूमि पर वन परिक्षेत्राधिकारी को सूचित कर काटा जा सकता है जबकि बाकी अन्य सभी प्रजातियों के पेड़ों को काटने के लिए वन विभाग की अनुमति अनिवार्य होगी। 

क्या बोले मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह ने बताया कि सरकार ने इमारती लकड़ी और ईंधन की लकड़ी की चोरी को रोकने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए आम और पांच अन्य प्रजातियों के पेड़ों के काटने पर तुरंत प्रभाव से रोक लगा दी है। इस निर्णय से वनों के अवैध कटान की रोकथाम होगी और राज्य की जैव विविधता को बचाने में भी मदद मिलेगी, साथ ही इससे न केवल स्वदेशी प्रजातियों का संरक्षण होगा, बल्कि वन्य जीव संरक्षण में भी मदद मिलेगी।

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