Edited By Vijay, Updated: 21 Mar, 2026 12:05 PM

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने निजी भूमि पर पेड़ों के कटान को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने ऊना जिले के मंडलीय वन अधिकारी (डीएफओ) के उस आदेश को खारिज कर दिया है....
शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने निजी भूमि पर पेड़ों के कटान को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने ऊना जिले के मंडलीय वन अधिकारी (डीएफओ) के उस आदेश को खारिज कर दिया है, जिसमें निजी जमीन पर खड़े सूखे और गिरे हुए खैर के पेड़ों को काटने की अनुमति देने से इंकार कर दिया गया था। न्यायाधीश ज्योत्स्ना रिवाल दुआ की अदालत ने कुलवंत सिंह और अन्य की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी जमीन का मालिकाना हक और कब्जा पूरी तरह से स्पष्ट है, तो वन विभाग तकनीकी आधारों का हवाला देकर अनुमति नहीं रोक सकता। हाईकोर्ट ने वन विभाग को सख्त निर्देश दिए हैं कि वह 2 सप्ताह के भीतर संबंधित भूमि का फिर से सीमांकन करे और सूखे तथा गिरे हुए पेड़ों की पहचान करे। इसके बाद, अगले दो सप्ताह के भीतर इन चिह्नित पेड़ों को काटने की विधिवत अनुमति प्रदान की जाए।
याचिकाकर्ता कुलवंत सिंह और अन्य ने अपनी निजी भूमि पर मौजूद सूखे और गिरे हुए खैर के पेड़ों के सीमांकन और कटान की अनुमति के लिए वन विभाग में आवेदन किया था, लेकिन डीएफओ ऊना ने 17 दिसम्बर 2024 को उनके आवेदन को यह कहकर खारिज कर दिया कि यह जमीन कभी राज्य सरकार के अधीन निहित थी, इसलिए नियमों के अनुसार पेड़ काटने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अदालत ने मामले के तथ्यों की बारीकी से जांच की और पाया कि हालांकि 1974 के अधिनियम के तहत यह भूमि सरकार के पास चली गई थी, लेकिन वर्ष 2001 के संशोधन के बाद इस जमीन को वापस शामलात मालिकों के नाम कर दिया गया था। वर्तमान में याचिकाकर्ता ही इस जमीन के पूर्ण स्वामी हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में माना कि जब जमीन पर मालिकों का कब्जा 1950 से पहले का है और खुद सरकार ने यह जमीन उन्हें वापस की है, तो ऐसे में वन विभाग द्वारा पेड़ काटने की अनुमति देने से इंकार करना कानूनन पूरी तरह से गलत है। इस फैसले से उन भू-मालिकों को बड़ी राहत मिली है, जो मालिकाना हक होने के बावजूद वन विभाग की तकनीकी आपत्तियों के कारण अपनी जमीन से सूखे पेड़ नहीं हटा पा रहे थे।
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