Edited By Kuldeep, Updated: 05 Feb, 2026 04:52 PM

हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार आज पूरी तरह भ्रम, बहानों और विफलताओं की राजनीति पर उतर आई है। एक ओर पंचायत और शहरी निकाय चुनावों को जानबूझकर टालकर यह सरकार लोकतंत्र की जड़ों पर प्रहार कर रही है....
पालमपुर (भृगु): हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार आज पूरी तरह भ्रम, बहानों और विफलताओं की राजनीति पर उतर आई है। एक ओर पंचायत और शहरी निकाय चुनावों को जानबूझकर टालकर यह सरकार लोकतंत्र की जड़ों पर प्रहार कर रही है, वहीं दूसरी ओर राजस्व घाटे और वित्तीय संकट का रोना रो-रोकर अपनी नीतिगत दिवालियापन को छिपाने की नाकाम कोशिश कर रही है। सच्चाई यह है कि कांग्रेस सरकार की हर विफलता का केंद्र बिंदु डर, दिशाहीनता और राजनीतिक स्वार्थ है। भाजपा नेता विपिन सिंह परमार ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आते ही यह तय कर लिया था कि पंचायत और शहरी निकाय चुनाव किसी भी सूरत में नहीं कराने हैं, क्योंकि उसे जमीनी स्तर पर अपनी हार साफ दिखाई दे रही है।
इसी डर के चलते कभी तकनीकी कारणों का बहाना बनाया गया, कभी कानूनी उलझनों का, तो कभी आपदा प्रबंधन कानून की आड़ लेकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कुचलने का प्रयास किया गया। यह प्रशासनिक मजबूरी नहीं, बल्कि कांग्रेस की सोची-समझी राजनीतिक कुनीति है। उन्होंने कहा कि 9 जनवरी को उच्च न्यायालय ने 30 अप्रैल तक पंचायत चुनाव संपन्न करवाने के स्पष्ट निर्देश दिए थे लेकिन कांग्रेस सरकार ने इन आदेशों का सम्मान करने की बजाय उन्हें कमजोर करने और टालने की नीति अपनाई। न तो निर्वाचन सूचियों का समय पर प्रकाशन हुआ, न ही वास्तविक चुनावी तैयारियां दिखाई दीं।
भारी कीमत चुकानी पड़ रही प्रदेश को
परमार ने कहा कि पंचायत और शहरी निकाय चुनाव न होने से प्रदेश को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। निर्वाचित स्थानीय निकायों के बिना केंद्र सरकार की सैंकड़ों योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन असंभव है। विशेष रूप से 16वें वित्त आयोग के तहत ग्रामीण और शहरी निकायों के लिए प्रस्तावित बड़ी धनराशि चुनाव न होने की स्थिति में या तो प्रदेश को मिलेगी ही नहीं या फिर वर्षों तक लटकती रहेगी। परमार ने कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा बार-बार राजस्व घाटा अनुदान बंद होने का रोना, दरअसल कांग्रेस सरकार की आर्थिक नाकामी की स्वीकारोक्ति है।