Kullu: स्वर्ग लोक से लौटे सृष्टि के रचयिता देव श्री बड़ा छंमाहू, 44 हजार रानियों की कैद में फंसे देवरथ को नहीं खींच पाए हजारों लोग

Edited By Kuldeep, Updated: 19 Mar, 2026 05:25 PM

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सराज घाटी की समृद्ध देव संस्कृति का एक और अद्भुत और चमत्कारिक अध्याय गत रविवार को उस समय देखने को मिला, जब सृष्टि के निर्माता और पालनहार माने जाने वाले देव श्री बड़ा छंमाहू 3 महीने के स्वर्ग प्रवास के बाद वापस धरती लोक पर लौटे।

कुल्लू (संजीव): सराज घाटी की समृद्ध देव संस्कृति का एक और अद्भुत और चमत्कारिक अध्याय गत रविवार को उस समय देखने को मिला, जब सृष्टि के निर्माता और पालनहार माने जाने वाले देव श्री बड़ा छंमाहू 3 महीने के स्वर्ग प्रवास के बाद वापस धरती लोक पर लौटे। देवराज इंद्र की सभा से लौटने की खुशी में हजारों श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य का स्वागत किया।

देव श्री बड़ा छंमाहू का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। उन्हें छह बड़े देवताओं की संयुक्त शक्ति माना जाता है, जिन्होंने सृष्टि का निर्माण किया। देव श्री बड़ा छंमाहू, जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश, आदि शक्ति और शेषनाग की सामूहिक शक्तियों का अवतार हैं, स्वर्ग से लौटते ही सबसे पहले अपनी 44 हजार रानियों (योगिनियों) से मिलने जाते हैं। वीरवार को जब देवता का रथ सोने-चांदी के आभूषणों और फूलों से सुसज्जित होकर कोटला गांव स्थित अपनी कोठी से माता चवाली के मंदिर की ओर रवाना हुआ तो समूचा वातावरण देवमयी हो गया।

कारदार मोहन सिंह व पुजारी धनेश गौतम के अनुसार अपनी रानियों से मिलते ही देवता उनके प्रेम प्रसंग में मदहोश हो जाते हैं। इस मिलन के दौरान एक भाव-विभोर कर देने वाला दृश्य तब उत्पन्न हुआ, जब इन 44 हजार रानियों ने प्रतीकात्मक रूप से देवरथ को अपनी बाहों में कैद कर लिया। मिलन के बाद जब श्रद्धालुओं व हरियानों ने देवरथ को वापस लाना चाहा तो रथ एक स्थान पर ही स्थिर हो गया।

जब विज्ञान पर भारी पड़ा विश्वास
सैंकड़ों लोगों ने डोरे के सहारे रथ को खींचने का प्रयास किया, लेकिन शक्ति के प्रतीक देवरथ टस से मस नहीं हुए। हरियानों व कारदारों ने तुरंत भांप लिया कि देव श्री बड़ा छंमाहू अपनी रानियों के वश में हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए परंपरा के अनुसार एक प्राचीन उपाय अपनाया गया। चूंकि योगिनियां अपवित्रता बर्दाश्त नहीं करतीं, इसलिए जब हरियानों ने देवरथ से बंधे डोरे में जुठ लगाई, तो रानियों ने देव का साथ छोड़ दिया और रथ तुरंत गतिशील हो गया।

जैसे ही देवरथ माता चवाली की कैद से मुक्त हुआ, समूची घाटी जयघोष से गूंज उठी। श्रद्धालुओं ने ढोल-नगाड़ों की थाप पर नृत्य करते हुए रथ को वापस कोटला गांव पहुंचाया, जहां सैंकड़ों महिलाओं व पुरुषों ने देवता पर फूल बरसाकर भव्य स्वागत किया।

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