Himachal : सेब की खेती पर मंडराया संकट, विशेषज्ञों ने दी ये चेतावनी

Edited By Swati Sharma, Updated: 22 Jan, 2026 04:21 PM

climate change poses a threat to apple cultivation in himachal pradesh

Himachal News: हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था और विरासत की पहचान माने जाने वाली सेब की फसल पर जलवायु परिवर्तन का गंभीर खतरा मंडराने लगा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि सर्दियों के तापमान में निरंतर वृद्धि और सेब पट्टी (एप्पल बेल्ट) में बफर्बारी की...

Himachal News: हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था और विरासत की पहचान माने जाने वाली सेब की फसल पर जलवायु परिवर्तन का गंभीर खतरा मंडराने लगा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि सर्दियों के तापमान में निरंतर वृद्धि और सेब पट्टी (एप्पल बेल्ट) में बफर्बारी की कमी के कारण विशेष रूप से निचले और मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सेब की पैदावार पर दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते हैं।

पिछले कुछ वर्षों के तापमान के आंकड़े बेहद चिंताजनक

डॉ. वाईएस परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के जलवायु परिवर्तन विभाग के प्रमुख प्रोफेसर सतीश भारद्वाज के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों के तापमान के आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब बागवान केवल सेब के भरोसे नहीं रह सकते क्योंकि बढ़ता तापमान पारंपरिक सेब पट्टी को धीरे-धीरे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर धकेल रहा है। इस साल सर्दियों के दौरान राज्य भर में असामान्य रूप से उच्च तापमान दर्ज किया गया है। गत 16 जनवरी को शिमला का न्यूनतम तापमान 10.5 डिग्री सेल्सियस और चौपाल का 10.3 डिग्री सेल्सियस रहा, जो सामान्य से लगभग 7.4 डिग्री अधिक था। डॉ. भारद्वाज ने बताया कि सेब की खेती के लिए सर्दियों की ठंड यानी‘चिलिंग आवर्स'(ठंड के घंटे) अनिवार्य होते हैं। सेब के पेड़ों को सुप्तावस्था (डोरमेंसी) में जाने के लिए 15 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान की निरंतर अवधि की आवश्यकता होती है। जब तापमान लंबे समय तक हिमांक के करीब रहता है, तब पेड़ अपनी अधिकतम सुप्तावस्था प्राप्त करते हैं। हालांकि, दिन के बढ़ते तापमान के कारण यह सुप्तावस्था समय से पहले ही टूट रही है, जिससे पेड़ों में असमय अंकुरण और खराब पुष्पन (फ्लावरिंग) की समस्या आ रही है।

कीटों का प्रकोप बढ़ रहा

गौरतलब है कि सेब की विभिन्न किस्मों को उनकी ठंड की आवश्यकता के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया है। पारंपरिक किस्मों को आमतौर पर 1,200 से 1,500 चिलिंग घंटों की आवश्यकता होती है, जबकि नई किस्में 300 से 500 घंटों में भी फल दे सकती हैं। ‘प्रोग्रेसिव ग्रोअर्स एसोसिएशन'के अध्यक्ष लोकेंद्र बिष्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन का सबसे घातक असर 6,000 फीट से कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में देखा जा रहा है। पर्याप्त ठंड न मिलने के कारण पौधे सही ढंग से सुप्तावस्था में नहीं जा पा रहे हैं, जिससे उनमें फफूंद जनित रोग और कीटों का प्रकोप बढ़ रहा है। पूर्व में जमा देने वाली ठंड स्वाभाविक रूप से इन कीटों को नियंत्रित रखती थी, जो अब संभव नहीं हो पा रहा है।

उल्लेखनीय है कि हिमाचल प्रदेश का सेब उद्योग लगभग 5,500 करोड़ रुपये का है और इससे 2.5 लाख से अधिक परिवार जुड़े हुए हैं। इस संकट को देखते हुए विशेषज्ञों ने बागवानों को वैकल्पिक फलों जैसे कीवी, अनार, नाशपाती और प्लम की खेती अपनाने की सलाह दी है। इसके साथ ही, बदलती जलवायु के बीच आजीविका को सुरक्षित रखने के लिए कम ठंड की आवश्यकता वाली (लो-चिलिंग) सेब की किस्मों की ओर धीरे-धीरे रुख करने पर जोर दिया गया है।

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