पत्तों से बनी देसी प्लेटों में लीजिए धाम का मज़ा (Watch Video)

Edited By Vijay, Updated: 27 Sep, 2019 04:27 PM

एक बार प्रयोग होने वाले प्लास्टिक पर रोक लगाने की प्रदेश सरकार की घोषणा से टौर के पत्तों से पत्तल बनाने वाले ग्रामीणों के चेहरे खिल उठे हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर द्वारा पहले थर्मोकोल पर बैन लगाने से और अब एक बार प्रयोग होने वाले...

मंडी (पुरुषोत्तम शर्मा): एक बार प्रयोग होने वाले प्लास्टिक पर रोक लगाने की प्रदेश सरकार की घोषणा से टौर के पत्तों से पत्तल बनाने वाले ग्रामीणों के चेहरे खिल उठे हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर द्वारा पहले थर्मोकोल पर बैन लगाने से और अब एक बार प्रयोग होने वाले प्लास्टिक पर भी रोक लगाने संबंधी जारी अधिसूचना के बाद प्रदेश में टौर के पत्तों से बनने वाली पत्तल के कारोबार में एक नई ऊर्जा आ गई है। पिछले काफी समय से थर्मोकोल से बनी चीजों की वजह से पत्तल का ट्रैंड ही खत्म होता जा रहा था। चम्मच से लेकर डोने तक थर्मोकोल के बने हुए आने से इन गरीब ग्रामीणों की तो जैसे कमर ही टूट गई थी। इस कारोबार से कई परिवार जंगलों में टौर की बेल से प्राकृतिक कच्चे माल से इसका निर्माण करते हैं।
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कई परिवारों की चल रही है रोजी-रोटी

टौर के पत्तों को बेचने वालों के लिए यह सस्ता और सुलभ कारोबार है। इससे कई परिवारों की रोजी-रोटी चली हुई है। मुख्यमंत्री के इस बैन से पत्तल बनाने वाले खुश तो हैं मगर इन लोगों की मांग है कि बाजार में थर्मोकोल के अलावा कागज की पत्तलों और गिलासों पर भी प्रतिबंध लगना चाहिए क्योंकि सभी प्रदूषण के वाहक हैं। इन लोगों को कहना है कि प्रदेश की हर धाम में टौर से बनी पत्तलों पर खाना परोसा जाता है जबकि मंडयाली धाम तो पत्तलों के बिना अधूरी है लेकिन स्टैंडिग खाने की संस्कृति ने पत्तल में खाने की परंपरा को लगभग खत्म कर दिया है।
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कारोबार में मंडी जिला के जुड़े हैं करीब 60 लोग

हिमाचल के गांवों में आज भी पत्तलों में खाने का रिवाज कायम है। बहरहाल टौर के पत्तों से पत्तल बनाने वाले परिवारों के लिए मुख्यमंत्री की घोषणा ने नई ऊर्जा भर दी है। उन्हें आस है कि थर्मोकोल से बने प्लेट-गिलास पर प्रतिबंध लगने से उनके कारोबार में तेजी आएगी। सेरी बाजार और डीसी ऑफिस के बाहर सड़क पर बैठने वाले पंडोह के सात मील के समीप बिहणधार से कौर सिंह, नागराज, बलदेव, इंद्र सिंह का कहना है कि इस कारोबार में जिला के करीब 60 लोग जुड़े हैं। पंडोह और सलापड़ में ही टौर के पत्ते जंगलों में पाए जाते हैं, जिन्हें बेल से निकालकर हम पत्तों को जोड़कर पत्तल तैयार करते हैं।

10 दिन तक हरी रहती है एक पत्तल

एक पत्तल करीब 10 दिन तक हरी रहती है, जिससे उसका प्रयोग हो पाता है। इनका कहना है कि सरकार ने थर्मोकोल के बाद अब एक बार प्रयोग होने वाले प्लास्टिक पर भी रोक लगा दी है, जिससे हमारा कारोबार चल सकता है। लोग आज भी पत्तल में ही खाना परम्परा के तहत शुभ मानते हैं लेकिन आजकल कैटरिंग की ठेकेदारी से हमारे उत्पाद कम लोग ही खरीद पा रहे हैं। हम 200 रुपए की 100 पत्तलें और इसी रेट से डोने देते हैं जबकि थर्मोकोल की चीजें सस्ती जरूर हैं लेकिन कैंसर जैसी बीमारियों का घर हैं। थर्मोकोल और प्लास्टिक बोतल में पानी लीवर को कमजोर करता है।

प्रदूषण नहीं प्रयोग के बाद बनती है खाद

कागज और थर्मोकोल से बनी पत्तलें जहां प्रदूषण फैलाती हैं वहीं टौर के पत्तों से बनी पत्तलें पूरी तरह से बाओडिग्रेडेबल हैं। इन पर खाना खाने के बाद गोबर की खाद बनाने वाली जगह पर फैंक दें तो इनकी भी प्राकृतिक खाद बन जाती है। इसलिए यह प्रदूषण मुक्त है। ग्रामीणों का कहना है कि अब हमारे यहां सिस्टम बदल गया है। थर्माोकोल और प्लास्टिक की पत्तल आ रही है। प्लास्टिक को गलने में हजारों साल लगते हैं लेकिन पत्तल प्रयोग करना लोगों ने सस्ते के चक्कर में कम किया है।

हम जिस पत्तल को भूल रहे, वो जर्मनी बना रहा

जर्मनी में पत्तलों को नैचुरल लीफ प्लेट्स कह कर इसका भरपूर उत्पादन हो रहा है। दरअसल इसी साल जर्मनी में एक नया स्टार्टअप शुरू हुआ है। लीफ रिपब्लिक के नाम से पत्तों से पत्तल बनाने का काम कुछ उद्यमियों ने शुरू किया और इसके लिए फंडिंग का जुगाड़ भी किया है। इसके लिए उन्होंने फैक्ट्ररी बना डाली है जिससे मशीनों में प्रैस करके प्लेट व कटोरी बना रहे हैं। उनका दावा है कि ये प्लास्टिक के बराबर ही मजबूत है लेकिन गलने में देर नहीं लगती। इनका धंधा इतना बढ़ गया है कि अब तो बाहर विदेश भी भेजने लगे हैं।

टौर के पत्तों से कारोबार करने वालों को करें प्रोत्साहित

मंडी बचाओ संघर्ष मोर्चा के लक्ष्मेंद्र गुलेरिया ने बताया कि सरकार द्वारा पहले थर्मोकोल पर प्रतिबंध लगाया गया और अब सिंगल यूज प्लास्टिक पर रोक का फैसला सराहनीय है लेकिन इसको सख्ती से लागू करना होगा तभी हमारा पर्यावरण सुरक्षित होगा। टौर के पत्तों से कारोबार करने वाले इन गरीब ग्रामीणों को स्थायी मार्कीट सरकार व नगर परिषद नहीं दे पाई है और इनको बैठने के लिए भी तंग किया जाता है जबकि मंडी में इनकी मांग बहुत है। इनको प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि पर्यावरण बचाने के साथ इन परिवारों को रोजी-रोटी भी मिल सके।

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